खेल का मैदान
एक छोटे से गांव में एक खेल का मैदान था। उस मैदान पर बच्चे-बच्चे रोजाना खेलते थे। वहाँ की बच्चियों ने चोटी काटी और वहाँ के लड़कों ने उनके बालों को अपने हाथों से बटुवा बना लिया। वे बहुत खुश थे उनके उम्र के सभी लोग उनके साथ होते थे और उनका खेल देखते थे।
उस गांव में एक हरा और बहुत बड़ा वृक्ष भी था। उस पेड़ की छाया मे लोग बैठ कर अपनी-अपनी कहानियां सुनते थे। वहाँ के लोग बहुत ही सदर व संयमी थे। बच्चों को खेलने में फुर्सत ही नहीं होती थी। उनका खेल देखने वाले लोग उनके खेलों से आनन्द मनते थे।
एक दिन एक रंगीन मेहमान उस गांव में हमारे बच्चों के मैदान में पहुँचा। उस व्यक्ति ने बच्चों को खेलते हुए देखा। उसमें बच्चों के जैसी खुशी देख कर उसे बचपन की यादें ताजगी से याद आने लगी। उसने कुछ समय बीताया हमारे बच्चों के मैदान में।
उस रंगीन मेहमान ने आगे बढ़ते हुए बच्चों से पूछा, “अपना पसंदीदा खेल क्या है?”
बच्चे-बच्चे बड़े उत्साह व संतोष से बोले, “हमें सभी खेल अच्छे लगते हैं, हम सभी में उत्साहित होते हैं। लेकिन हमें खेल मैदान बहुत छोटा है, जब तक आप बड़ा मैदान नहीं दिखाते, हम आपको अपने पसंद के खेल नहीं बताएंगे।”
यह सुनकर वह मेहमान अपनी अपनी आँखों और दिमाग में खो गए। वह जब भी किसी से मिलता था तब में उसके बचपन की कहानी सुनता था, इस समय उसे अपने बचपन के खेल कूच और खेल मैदान की याद आई।
उसने उन बच्चों से वचन दिया कि वह एक बहुत बड़े मैदान ले आएंगे जहाँ कंधों कंध रखकर सभी खेल खेल सकें। जब बच्चों ने उसका यह वचन सुना तो वे बहुत खुश हो गए।
उस दिन से वह रंगीन मेहमान लगातार मैदान तलाशने में था। आखिर वह उसे एक जगह मिल गयी जहाँ बड़ा मैदान था।
उसने वहाँ मैदान बनवा दिया। जब बच्चों ने उस मैदान को देखा तो वे बहुत खुश थे। यह मैदान उन सभी सपनों की पूर्ति थी जो वे किसी दिन अपने दिल में घराते थे।
वह खेल मैदान अपने नए रूप में बन गया था लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबियां वहीं थी। उनमें कई बच्चों की भावनाएं जुड़ी थी और उन्होंने उस मैदान से काफी यादें जुड़ाई थी।
जब सूरज ढलने लगा तब बच्चों ने सोचा किस खेल से शुरू करें। उन्होंने फुटबॉल खेला। दौड़ लगी तो हमारे रंगीन मेहमान ने उन्हें दौड़ की ओर संबोधित किया।
बच्चों ने उनके आदेश से तेज दौड़ करते हुए चारों ओर लगातार दौड़ा। तब सभी बच्चों ने कुछ टाइम कैप्टेन चुना। उसके बाद बच्चे खेल खेलते रहे।
बच्चों ने वह मैदान इस तरह से अपने खेल से जोड़ा कि उसके बिना वह मैदान कुछ भी नहीं था। वहाँ का मौसम भी उनके साथ था। उनका खेल होता तो उजाला रहता था और अगर वह पूरे हो जाता तो अंधेरे का सामना करते हुए घर की तरफ चलते थे।
इस मैदान के फलस्वरूप उनकी मोहब्बत मैदान की ओर उतारने लगी। इसी बीच उनके आगे कुछ दोस्त बच्चों ने दो टीम तैयार की, देखते ही वह सभी बच्चे खुश हो गए।
सभी बच्चे उत्साह पूर्वक दौड़ने लगे और उस मैदान में बहुत सारे खेल खेले। उनमें फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, थोथा चानव इत्यादि शामिल थे।
अंत में, वह मेहमान दल ने बच्चों को अपनी सलाह दी, ” देखो बच्चों, मैदान की सबसे बड़ी प्रतिकृति है एकता। कोई खेल तब भी अच्छा होता है जब हम सभी साथ में खेलने की कोशिश करते हैं।”
बच्चों ने उनके आदेशों का पालन किया और सभी मिलकर खेलते रहे। वहाँ खेलते टीमों ने दोस्ती और एकता का वादा किया।
उस मैदान के आसपास सब लोग खुश थे। उन्हें यकीन था कि इस खेल के मैदान ने सबको एकजुट होने वाली शक्ति दी।
वह खेल मैदान आज भी उन बच्चों के लिए वही खेल मैदान है जहाँ वे अपना खेल खेलते हैं और अपने सपनों को पूरा करते हैं।