सुंदरवन का दयालु संरक्षक: गजराज
सुंदरवन के घने जंगलों में गजराज नाम का एक विशालकाय हाथी रहता था। वह न केवल बलवान था, बल्कि उसका हृदय भी अत्यंत कोमल और दयालु था। जब भी जंगल का कोई जीव संकट में होता, गजराज उसकी मदद के लिए सबसे पहले दौड़ पड़ता था। एक बार मानसून के दिनों में नदी में भीषण बाढ़ आ गई। जंगल के सभी जानवर अपनी जान बचाकर भाग रहे थे, तभी गजराज की नज़र एक नन्हे हिरण चीकू पर पड़ी, जो पानी के तेज बहाव में बह रहा था और अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था।
अपनी जान की परवाह न करते हुए, गजराज ने उफनती नदी में छलांग लगा दी। उसने अपनी सूंड से चीकू को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन इस प्रयास में एक भारी और नुकीली लकड़ी का लट्ठा गजराज की दाहिनी आंख पर जोर से लगा। इस चोट के कारण गजराज की एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। चीकू ने रोते हुए गजराज को धन्यवाद दिया, पर गजराज ने मुस्कुराकर कहा, “नन्हे दोस्त, दूसरों की रक्षा करना ही तो मेरा धर्म है।”
समय का चक्र और गजराज का एकाकीपन
समय बीतता गया और जंगल के नियम के अनुसार गजराज अब बूढ़ा हो चला था। उम्र के साथ उसकी दूसरी आंख की रोशनी भी चली गई और वह पूरी तरह अंधा और कमजोर हो गया। विडंबना देखिए, जो जानवर कभी अपनी सुरक्षा के लिए गजराज के आगे-पीछे घूमते थे, वे अब उसे एक बेकार बोझ समझने लगे। सबने धीरे-धीरे उससे मुंह मोड़ लिया। गजराज अब अकेले एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठा रहता और अपनी लाचारी पर आंसू बहाता।
एक दोपहर, अचानक जंगल में दावानल (जंगल की आग) भड़क उठी। सूखी पत्तियां और तेज हवाएं आग की लपटों को तेजी से गजराज के ठिकाने की तरफ ला रही थीं। सभी जानवर चीखते-चिल्लाते अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। अंधा होने के कारण गजराज दिशाहीन होकर इधर-उधर टकरा रहा था। वह असहाय होकर अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगा। तभी उसे एक जानी-पहचानी और सुरीली आवाज सुनाई दी, “दादाजी, घबराइए मत! मैं आ गया हूं। आप अकेले नहीं हैं।”
कृतज्ञता की अनूठी मिसाल
यह वही चीकू था, जो अब एक बड़ा और फुर्तीला हिरण बन चुका था। चीकू के साथ उसकी मित्र एक नन्ही गौरैया भी थी। संकट की इस घड़ी में चीकू ने गजराज को अकेला नहीं छोड़ा। गौरैया हवा में उड़कर सुरक्षित मार्ग देख रही थी और चीकू अपनी पीठ को गजराज के पैरों से सटाकर उसे रास्ता दिखा रहा था। चीकू ने कहा, “दादाजी, जब मैं छोटा था, तब आपने अपनी आंख खोकर मेरी जान बचाई थी। आज आपकी इस हालत में मैं आपको आग के हवाले कैसे कर सकता हूं?”
चीकू के मार्गदर्शन में गजराज धीरे-धीरे आगे बढ़ा और वे तीनों सुरक्षित नदी के किनारे पहुंच गए। गजराज की अंधी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन इस बार ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि परम संतोष और प्रेम के थे। अन्य स्वार्थी जानवरों ने जब यह देखा, तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और उनके सिर शर्म से झुक गए।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में किए गए अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करते हैं, तो समय आने पर वह भलाई हमारे पास वापस जरूर आती है। संकट के समय अपनों का साथ न छोड़ना और किए गए उपकार को कभी न भूलना ही सबसे बड़ा मानवीय धर्म है।