गांधीजी का ‘अपरिग्रह’ बिका 14 करोड़ में: पूंजीवाद की गोद में मुस्कुराए बापू!

वाह रे दुनिया! और दोगुना वाह रे वैश्विक पूंजीवाद! जो इंसान जिंदगी भर ‘अपरिग्रह’ (जरूरत से ज्यादा संपत्ति न जुटाने) का उपदेश देता रहा, जिसके पास खुद की संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक लाठी, एक चश्मा, एक घड़ी और एक फटी हुई धोती थी, आज उसी के हाथ से लिखे चंद पन्ने नीलामी में 1.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 14 करोड़ रुपये में बिक गए। इसे कहते हैं मोक्ष का असली विमुद्रीकरण और समाजवाद का सबसे महंगा अंत!

अपरिग्रह का सबसे अमीर सौदा

लंदन की आलीशान नीलामी में जब महात्मा गांधी के उन विचारों की बोली लग रही थी, तो यकीनन स्वर्ग में बैठे बापू अपना सिर पीट रहे होंगे। जो विचार उन्होंने भारत के गरीबों को मुफ्त में बांटे थे, आज वे दुनिया के किसी परम-पूंजीपति के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाएंगे। सोचिए, जिस गांधी ने जीवन भर चरखा काता ताकि देश का गरीब स्वावलंबी बन सके, आज उसी गांधी के फटे-पुराने कागजों को खरीदने के लिए रईसों में होड़ मची है। यह समाजवाद के मुंह पर शुद्ध पूंजीवाद का सबसे करारा तमाचा है, लेकिन घबराइए मत, यह तमाचा बिल्कुल ‘अहिंसक’ तरीके से मारा गया है!

भारतीय नेताओं के लिए ‘अमूल्य’ सीख

हमारे देश के माननीय नेताओं को इस खबर से बड़ी गंभीर प्रेरणा लेनी चाहिए। वे जो रोज सुबह-शाम गांधी के नाम की कसमें खाते हैं, सफेद खादी पहनकर कैमरे के सामने झाड़ू लगाते हैं, उन्हें समझ जाना चाहिए कि गांधी सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि एक बेहतरीन ‘इन्वेस्टमेंट’ भी हैं! भारत के नेताओं को अपने लिखे हुए सारे भाषण और यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर दिए गए लिखित स्पष्टीकरण भी संभाल कर रखने चाहिए। क्या पता भविष्य में जब उनकी अपनी राजनीति कबाड़ हो जाए, तो उनके ये पुराने कागजात ही करोड़ों डॉलर में नीलाम होकर उनके बुढ़ापे का सहारा बन जाएं?

गांधी सिर्फ नोटों पर नहीं, अब खुद ‘नोट’ हैं!

अभी तक भारतीय जनता यही समझती थी कि गांधीजी सिर्फ रिज़र्व बैंक के नोटों पर ही अच्छे लगते हैं। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय नीलामी ने साबित कर दिया कि गांधीजी सिर्फ नोट पर छपते नहीं हैं, बल्कि वे खुद में ही एक बहुत बड़ा ‘जैकपॉट’ हैं। आज के दौर में जब देश में महंगाई और भुखमरी पर बात होती है, तो हमारे हुक्मरान गांधीजी के ‘मौन व्रत’ का पालन करने लगते हैं। काश! हमारे नेता बापू के विचारों को केवल विदेशी तिजोरियों में बंद करवाने के बजाय, थोड़ा-बहुत अपने आचरण में भी उतार पाते। खैर, ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि बापू के लिखे नोट तो अब बिके हैं, उनके विचार तो इस देश की राजनीति में बहुत पहले ही बेचे जा चुके हैं!</p


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कागा जी