गार्डियन की ‘अधीर’ महिलाएं और सरकारी धैर्य का ‘अमृत काल’

पश्चिम का चश्मा और भारतीय नारी का ‘अति-उत्साह’

वाह! ‘द गार्डियन’ के गोरे पत्रकारों को आखिरकार भारत में कुछ ‘अधीर’ महिलाएं मिल ही गईं। वे लिख रहे हैं कि भारतीय महिलाएं बदलाव के लिए बहुत उतावली हो रही हैं। अब इन फिरंगियों को कौन समझाए कि हमारे देश में महिलाओं को ‘देवी’ का दर्जा प्राप्त है। और देवियां कभी अधीर नहीं होतीं, वे तो बस ‘वरदान’ देने या ‘महिषासुर मर्दन’ के लिए सही समय का इंतजार करती हैं। लेकिन नहीं, इन विदेशी पत्रकारों को तो हर बात में आंदोलन और बदलाव देखना है। भला भारतीय संस्कृति में ‘धैर्य’ से बड़ा कोई आभूषण है क्या?

‘अमृत काल’ में धैर्य की कठिन परीक्षा

मोदी सरकार के इस स्वर्णिम ‘अमृत काल’ में जब सब कुछ इतनी शांति और गति से चल रहा है, तो इन महिलाओं को अचानक किस बात की जल्दी है? जंतर-मंतर पर देश का नाम रोशन करने वाली पहलवान बेटियां न्याय की गुहार लगा रही थीं, तो हमारे माननीय नेताओं और व्यवस्था ने कितना अनुकरणीय धैर्य दिखाया! उन्होंने उनकी बात सुनने के लिए महीनों तक अपने कान, आंखें और अंतरात्मा बंद रखने की ‘महान योग साधना’ की। इसे कहते हैं असली धैर्य। लेकिन विदेशी मीडिया को तो सिर्फ ‘अधीरता’ दिखाई देती है। आखिर महिला सुरक्षा और न्याय जैसे छोटे-मोटे मुद्दों के लिए भला कुछ साल का इंतजार भी कोई बड़ी बात है?

‘बेटी बचाओ’ से ‘बैरिकेड लगाओ’ तक का अद्भुत सफर

हमारी संवेदनशील व्यवस्था ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कितने नायाब इंतजाम किए हैं। जब भी वे अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए सड़क पर उतरती हैं, पुलिस प्रशासन उनके स्वागत में चमचमाते हुए लोहे के भारी-भरकम ‘बैरिकेड’ की दीवार खड़ी कर देता है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सरकार उनकी सुरक्षा को लेकर कितनी चिंतित है—इतनी कि उन्हें आगे बढ़ने ही नहीं देना चाहती! वॉटर कैनन की ठंडी बौछारें और लाठियां तो बस इसलिए चलाई जाती हैं ताकि आंदोलन की गर्मी में हमारी देवियों का तापमान नियंत्रण में रहे और वे ‘कूल’ महसूस करें।

काक-वाणी का कड़वा सच

असल में, समस्या महिलाओं की ‘अधीरता’ में नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था के ‘अनंत धैर्य’ में है। जब तक न्याय की फाइलें लाल फीते से आजाद होंगी, तब तक एक और सदी बीत चुकी होगी। इसलिए, देवियों! थोड़ा धैर्य रखिए। जब सरकार ने कह दिया है कि ‘अमृत काल’ चल रहा है, तो बस अमृत का स्वाद लीजिए, चाहे वह कितना ही कड़वा क्यों न लगे। बदलाव का क्या है, वह तो 2047 तक आ ही जाएगा। तब तक विदेशी अखबारों को इंटरव्यू दीजिए और अपने इस ‘अधीर’ होने के अधिकार का आनंद उठाइए!


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कागा जी