वाह! क्या जमाना आ गया है। हम सोच रहे थे कि देश के नागरिक अब केवल हवा, राष्ट्रवाद और भव्य भाषणों के दम पर जीना सीख गए हैं। लेकिन नहीं, इन आम लोगों की जिद तो देखिए! इन्हें सुबह की चाय में अभी भी असली चीनी चाहिए, वह भी सस्ती। ‘टेलीग्राफ इंडिया’ के संपादकीय ने इस कड़वे सच से पर्दा उठा दिया है कि चीनी के बढ़ते दामों ने भारतीय राजनीति में फिर से उन बोरिंग ‘भौतिक चिंताओं’ (यानी रोटी, कपड़ा, मकान और राशन) को वापस ला खड़ा किया है, जिन्हें हमारे दूरदर्शी नेताओं ने बड़ी मेहनत से चुनावी विमर्श के इतिहास से गायब कर दिया था।
‘अमृत काल’ में चीनी की यह गुस्ताखी!
सत्तारूढ़ दल के थिंक-टैंक दिन-रात एक करके जनता को यह समझाने में लगे थे कि असली मिठास तो देश की वैश्विक साख और बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं में है। मगर इस नासमझ जनता को देखिए, इन्हें वैश्विक सूचकांकों से ज्यादा अपने रसोई के बजट की कड़वाहट सता रही है। चीनी महंगी क्या हुई, आम जनता ने सीधे अपनी चाय का स्वाद याद कर लिया। अब वे टीवी डिबेट्स के दिव्य ज्ञान को छोड़कर अपनी जेब टटोलने लगे हैं। यह तो सरासर विकास के रथ का पहिया पंचर करने की साजिश है!
जब भव्य भाषणों पर भारी पड़ी गृहणियों की हाय
राजनीति के आधुनिक पंडित हैरान हैं कि आखिर कैसे पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की गर्जना के बीच एक कप फीकी चाय ने इतना शोर मचा दिया। हमारे राजनेता चाहते थे कि चुनाव केवल इतिहास के गौरव और दुश्मनों को धूल चटाने के नाम पर लड़े जाएं। लेकिन ये भौतिक मुद्दे—जैसे महंगाई और चीनी के दाम—कितने ढीठ हैं, बिना बुलाए मेहमान की तरह फिर से चुनावी रैलियों में घुस आए हैं। अब नेताओं को फिर से मंच पर खड़े होकर चीनी, तेल और दाल के भाव पर सफाई देनी पड़ रही है, जो उनके हाई-फाई राजनीतिक एजेंडे के लिए बेहद कष्टदायक है।
अंततः, ‘काक-वाणी’ तो जनता को यही सलाह देगी कि उन्हें अपनी जीभ पर थोड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। जब सरकार आपको वादों की इतनी मीठी-मीठी गोलियां मुफ्त में बांट रही है, तो फिर चाय में चीनी डालकर कैलोरी और खर्च बढ़ाने की क्या जरूरत है? देशहित में फीकी चाय पीजिए और राष्ट्रवाद के मीठे घूंट भरिए, क्योंकि असली विकास तो वैसे भी फाइलों में ही सबसे मीठा लगता है!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें