चुनाव आयोग से ‘त्रिपल’ फाइट: जब ‘इंडिया’ गठबंधन ने कागजी मैदान पर तलवारें खींच लीं!

राम-राम भाई! ‘काक-वाणी’ की मुंडेर पर आप सभी का स्वागत है। आज हमारे कौवे ने खबर लाई है कि ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के सूरमाओं ने चुनाव आयोग (EC) के खिलाफ एक ऐतिहासिक ‘त्रिकोणीय’ युद्ध की घोषणा कर दी है। जी हां, विपक्षी दिग्गजों ने कसम खाई है कि अब यह लड़ाई केवल बयानों तक सीमित नहीं रहेगी। अब ‘पॉलिटिकल, लीगल और ग्राउंड’ यानी राजनीतिक, कानूनी और जमीनी स्तर पर आर-पार की जंग होगी। सुनकर ही हमारे कौवे की छाती गर्व से थोड़ी फूल गई है!

जमीनी जंग: एसी रूम से ट्विटर हैंडल तक का सफर

सबसे पहले बात करते हैं इनकी ‘ग्राउंड फाइट’ यानी जमीनी लड़ाई की। विपक्षी नेताओं के लिए ‘ग्राउंड’ का मतलब अमूमन उस आलीशान पांच सितारा होटल के कालीन से होता है, जहां गठबंधन की बैठकें होती हैं। इस जमीनी जंग की शुरुआत ट्विटर (अब एक्स) पर किसी कड़े विरोध वाले हैशटैग से होगी और शाम होते-होते कड़क चाय की चुस्कियों के साथ टीवी चैनलों के स्टूडियो में समाप्त हो जाएगी। वैसे, इस गठबंधन के पास जमीन पर लड़ने के लिए कार्यकर्ता कम और टीवी पर ज्ञान देने वाले प्रवक्ता ज्यादा हैं। लेकिन चिंता मत कीजिए, इस बार वे सचमुच जमीन पर उतरेंगे—शायद अपनी चमचमाती लग्जरी गाड़ियों से उतरकर प्रेस कॉन्फ्रेंस के मंच तक जाने के लिए!

कानूनी लड़ाई: सुप्रीम कोर्ट के चक्कर और ईवीएम का विलाप

अब आते हैं ‘लीगल फाइट’ पर। इस मोर्चे पर गठबंधन के पास बड़े-बड़े वकीलों की पूरी फौज है जो दिन में नेतागिरी और कोर्ट के समय वकालत करते हैं। इनका सबसे पसंदीदा वीकेंड प्लान होता है—सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करना। मुद्दा चाहे जो हो, कोर्ट जाना तय है। अगर कोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला सुनाया, तो “संविधान की जीत”, और अगर याचिका खारिज हो गई, तो “संस्थाएं बिक चुकी हैं!” और हां, इस कानूनी जंग का मुख्य विलेन तो हमेशा की तरह बेचारा ‘ईवीएम’ ही रहेगा। जब ये चुनाव जीतते हैं तो ईवीएम गंगा जल की तरह पवित्र हो जाता है, और जब हारते हैं, तो उसी ईवीएम में हैकिंग के भूत नजर आने लगते हैं।

पॉलिटिकल फाइट: अपनों से लड़ें या आयोग से?

आखिरी और सबसे मजेदार है ‘पॉलिटिकल फाइट’। चुनाव आयोग से राजनीतिक रूप से लड़ने की कसम खाने वाले ये दल पहले आपस में तो सीट-शेयरिंग का राजनीतिक युद्ध निपटा लें! बंगाल में दीदी अलग हुंकार भर रही हैं, पंजाब में आप और कांग्रेस नूरा-कुश्ती खेल रहे हैं, और यूपी में अखिलेश बाबू अपनी अलग डफली बजा रहे हैं। जब आपस में ही सिर फुटौव्वल मची हो, तो आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलना एक बेहतरीन ‘डाइवर्जन’ यानी ध्यान भटकाने का तरीका है।

‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि इस त्रिकोणीय जंग की घोषणा से चुनाव आयोग डरा हो या न डरा हो, लेकिन देश की जनता का भरपूर मनोरंजन होना तय है। लड़ते रहिए हुजूर, क्योंकि बिना इस ड्रामे के भारतीय लोकतंत्र का स्वाद अधूरा ही रहेगा!


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कागा जी