वाह! लंदन के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर भारत की चिंता करने वाले ‘द इकोनॉमिस्ट’ के गोरे साहबों को अचानक हमारे लिए दर्द महसूस होने लगा है। उनका कहना है कि भारत सरकार घुसपैठियों को रोकने के चक्कर में अपने ही नागरिकों को जाल में फंसा रही है। अब इन फिरंगियों को कौन समझाए कि हमारे देश में जब तक नागरिक ‘लाइन’ में न लगे, तब तक उसे अपनी देशभक्ति का अहसास ही नहीं होता!
कागज ढूंढने का राष्ट्रीय खेल और ‘क्रोनोलॉजी’
हमारे देश में वैसे तो खेलों को बहुत बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन ‘दस्तावेज ढूंढो’ जैसा रोमांचक खेल शायद ही दुनिया के किसी और कोने में खेला जाता हो। अमित शाह जी की वो प्रसिद्ध ‘क्रोनोलॉजी’ तो आपको याद ही होगी। पहले नागरिकता कानून आएगा, फिर रजिस्टर बनेगा, और फिर देश का आम नागरिक अपने दादा-परदादा का जन्म प्रमाणपत्र ढूंढने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटेगा। विदेशी मीडिया को लगता है कि यह प्रताड़ना है। अरे भाई, यह प्रताड़ना नहीं, अपने इतिहास से जुड़ने का अनोखा सरकारी तरीका है! अब अगर इस चक्कर में कुछ लाख असली भारतीय नागरिक भी ‘संदिग्ध’ घोषित हो जाएं, तो देशहित में इतना बलिदान तो बनता ही है ना?
घुसपैठियों की खोज में स्वदेशी नागरिकों का ‘टेस्ट’
द इकोनॉमिस्ट बाबू को इस बात पर गहरी आपत्ति है कि भारत अपने ही लोगों को असमंजस के पिंजरे में डाल रहा है। अरे साहब, शेर को काबू करने के लिए कभी-कभी अपनी ही बकरियों को भी खूंटे से बांधना पड़ता है। अब बॉर्डर पर फेंसिंग लगाने से ज्यादा आसान तो यही है कि देश के अंदर ही हर नागरिक के गले में ‘संदेह’ का पट्टा बांध दिया जाए।
मजेदार बात यह है कि असली घुसपैठिया तो पचास रुपये में फर्जी आधार कार्ड बनवाकर मजे से घूम रहा है, जबकि बिहार या असम की बाढ़ में अपने कागज गंवा चुका एक गरीब किसान आज भी खुद को ‘विदेशी’ साबित होने से बचाने के लिए वकीलों के पैर छू रहा है। लेकिन सरकार का इरादा बिल्कुल साफ है – डिजिटल इंडिया में कागजी सबूतों से बड़ा कोई भगवान नहीं है। जब तक आप पुलिस थाने में जाकर यह साबित न कर दें कि आपके पूर्वज इसी मिट्टी में दफन हैं, तब तक आपकी नागरिकता केवल एक ‘अफवाह’ मानी जाएगी।
काक-वाणी की अंतिम सीख
तो हे भारतवासियों! पश्चिमी मीडिया के इस विलाप पर बिल्कुल ध्यान मत दीजिए। अगर सरकार आपको घुसपैठिया समझकर लाइन में खड़ा करती है, तो गर्व महसूस कीजिए कि आप इस ऐतिहासिक ‘सफाई अभियान’ का हिस्सा हैं। आखिर, जब तक देश की आधी आबादी खुद को नागरिक साबित करने के मुकदमे नहीं लड़ेगी, तब तक वकीलों का घर कैसे चलेगा और देश की जीडीपी कैसे बढ़ेगी? द इकोनॉमिस्ट वाले क्या जानें कि भारत में असली नागरिकता तो सरकारी बाबू की टेबल के नीचे से होकर गुजरती है!
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