बुद्धिजीवियों के सबसे प्रिय अखबार ‘द हिंदू’ ने आखिरकार गंभीर खोजबीन के बाद ढूंढ ही लिया कि भारत की विपक्षी राजनीति में ‘गांधी’ का पुनरुत्थान कैसे हो रहा है। हम तो साधारण कौवे हैं, समझ रहे थे कि यह सिर्फ चुनावी मौसम का कोहरा है, लेकिन नहीं! यह तो गहरा राजनीतिक दर्शन है। ‘काक-वाणी’ की मुंडेर से देखने पर यह पुनरुत्थान कुछ वैसा ही लगता है, जैसे बॉलीवुड में किसी बड़े स्टार-किड की दसवीं बार ‘री-लॉन्चिंग’ फिल्म आती है और हर बार दरबारी क्रिटिक्स इसे सिनेमा के इतिहास की सबसे महान फिल्म घोषित कर देते हैं।
री-लॉन्चिंग का अंतहीन चक्र: विज्ञान की समझ से परे
आम तौर पर जीव विज्ञान कहता है कि इंसान का जन्म एक ही बार होता है। लेकिन भारतीय राजनीति, विशेषकर कांग्रेस के इकोसिस्टम में, ‘पुनर्जन्म’ और ‘इमर्जेंस’ की प्रक्रिया हर दो साल में अनिवार्य रूप से दोहराई जाती है। कभी आलू से सोना बनाने वाली गंभीर रिसर्च के बाद, तो कभी भारत भ्रमण की लंबी पदयात्रा के बाद, हमारे प्रिय नेता अचानक ‘री-इमर्ज’ हो जाते हैं। ‘द हिंदू’ के विश्लेषक इस घटना को ऐसे समझाते हैं जैसे न्यूटन का चौथा नियम खोज लिया गया हो। जनता सोचती रही कि यह सिर्फ सफेद टी-शर्ट और बढ़ी हुई दाढ़ी का कमाल है, पर बुद्धिजीवियों ने इसमें भी ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ जैसी थ्योरी ढूंढ निकाली।
बुद्धिजीवियों की ‘गांधी-भक्ति’ और काक-दृष्टि
इस बार का ‘इमर्जेंस’ थोड़ा अलग है। अब वे संसद में हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर खड़े होते हैं, मानो सारा ज्ञान उसी लाल जिल्द के भीतर ही सिमट आया हो। काक-वाणी के पाठकों को यह समझना होगा कि इस बार की री-लॉन्चिंग में ‘इमोशन’ का तड़का ज्यादा है। जनता भी हैरान है कि जिस नेता को वे हर चुनाव के बाद किसी अज्ञात देश में हॉलिडे मनाते देखते थे, वे अचानक देश के सबसे गंभीर चिंतक कैसे बन गए? खैर, विपक्ष को संजीवनी मिलनी ही चाहिए, भले ही इसके लिए हर बार संजीवनी बूटी की जगह ‘नेहरू-गांधी’ ब्रांड का पुराना काढ़ा ही क्यों न उबालना पड़े।
असल में, लुटियंस दिल्ली के पत्रकारों को भी हर हफ्ते एक नया ‘गांधी’ चाहिए होता है ताकि वे अपने संडे कॉलम लिख सकें। जब विपक्ष के पास कोई ठोस नीति नहीं बचती, तो वे पुराने ब्रांड पर नया रैपर चिपकाकर बाजार में उतार देते हैं। ‘द हिंदू’ ने तो मान ही लिया है कि इस बार का उभार अंतिम और स्थायी है, ठीक वैसे ही जैसे वे पिछली नौ बार भी मान चुके थे।
काक-वाणी का स्पष्ट मत है: राजनीति में यह पुनरुत्थान तब तक होता रहेगा, जब तक पार्टी में कोई दूसरा नया चेहरा ढूंढने की हिम्मत न आ जाए। तब तक, हर नए चुनाव से पहले ‘गांधी’ का एक नया सॉफ्टवेयर अपडेट आता रहेगा, और बुद्धिजीवी उसे ‘क्रांति’ बताकर ताली बजाते रहेंगे।
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