आखिरकार, ‘स्वराज्य’ पत्रिका ने उस परम सत्य पर से पर्दा उठा ही दिया, जिसे हम सब अब तक ‘सिस्टम की सुस्ती’ समझकर कोस रहे थे। सच तो यह है कि हमारी महान भारतीय नौकरशाही को बनाया ही इसलिए गया था ताकि वह किसी के प्रति जवाबदेह न रहे। अब बताइए, जिसे डिजाइन ही ‘लाट साहब’ की तरह रहने के लिए किया गया हो, उससे आप उम्मीद करते हैं कि वह जनता के सामने हाथ जोड़कर अपनी फाइलों का हिसाब दे? यह तो इस महान कलात्मक व्यवस्था का सरासर अपमान है!
अंग्रेजों की पावन विरासत और हमारे ‘काले साहब’
हमारे देश के ‘स्टील फ्रेम’ कहे जाने वाले आईएएस अधिकारियों का मूल काम देश चलाना नहीं, बल्कि देश को खुद से बचाना है। अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को इसलिए गढ़ा था ताकि वे भारतीयों से दूरी बनाकर हुकूमत कर सकें। हमारे आज के बाबुओं ने इस औपनिवेशिक विरासत को संभाल कर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अगर कोई आम नागरिक किसी साहब से मिलकर अपनी समस्या बताना चाहे, तो साहब के अर्दली का ‘साहब मीटिंग में हैं’ वाला वाक्य सुनकर ही नागरिक खुद को धन्य महसूस करता है। फाइल का एक मेज से दूसरी मेज तक का सफर पूरा होने में जो वर्षों का समय लगता है, वह वास्तव में समय की बर्बादी नहीं, बल्कि बाबू संस्कृति का गहन ‘ध्यान-योग’ है।
‘जवाबदेही’ यानी देश की संप्रभुता पर सीधा खतरा!
सोचिए, अगर ये बेचारे नौकरशाह जनता के प्रति जवाबदेह हो गए, तो इस देश का क्या होगा? अगर वे हर टूटी सड़क, गिरते पुल और फाइलों के मकड़जाल पर जवाब देने लगे, तो लुटियंस दिल्ली के आलीशान क्लबों में गोल्फ कौन खेलेगा? शाम की शानदार कॉकटेल पार्टियों में देश की तरक्की का खाका कैसे खिंचेगा? जवाबदेही तो आम जनता और छोटे-मोटे संविदा कर्मचारियों के लिए होती है। जो लोग यूपीएससी का कड़ा इम्तिहान पास करके, लाल बत्ती (जो अब भले ही गाड़ी पर न हो, पर उनके रसूख में जलती है) के हकदार बने हैं, उन्हें इस तुच्छ ‘जवाबदेही’ के बंधन में बांधना उनके ज्ञान का अपमान है।
सदा सर्वदा सुखी रहे हमारा बाबू तंत्र
इसलिए, ‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मत है कि स्वराज्य के इस लेख को देश के हर सरकारी दफ्तर के बाहर सुनहरे अक्षरों में टांग दिया जाना चाहिए। जनता को यह समझ लेना चाहिए कि फाइल का न हिलना ही देश की स्थिरता की असली गारंटी है। हमारी भारतीय नौकरशाही को इस बात के लिए विशेष पदक मिलना चाहिए कि उन्होंने सदियों पुरानी उस व्यवस्था को आज भी जीवंत रखा है, जहां ‘जवाब न देना’ ही सबसे बड़ा उत्तर है। आइए, हम सब मिलकर इस गैर-जवाबदेह ढांचे की आरती उतारें और कहें- ‘हे बाबू देव! आप आराम से चाय पीजिए, फाइल हम खुद ढूंढ लेंगे।’
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