मुगल सल्तनत में शहंशाह अकबर के न्याय की चर्चा चारों ओर थी। लेकिन कभी-कभी अत्यधिक क्रोध इंसान की बुद्धि पर पर्दा डाल देता है। ऐसी ही एक शाम, महल के सबसे पुराने और वफादार सेवक रामू से सफाई करते समय गलती से चीन का एक बेहद कीमती और दुर्लभ गुलदस्ता टूट गया। वह गुलदस्ता शहंशाह अकबर को अपनी बेगम की याद में बेहद प्रिय था।
क्रोध की वेदी पर न्याय
गुलदस्ते को टूटा देख अकबर का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। गुस्से में अंधा होकर उन्होंने तुरंत आदेश दिया, “रामू को कल सुबह फांसी पर लटका दिया जाए।” पूरा दरबार सन्न रह गया। रामू ने सालों तक वफादारी से महल की सेवा की थी, लेकिन किसी में भी शहंशाह के इस क्रूर फैसले का विरोध करने का साहस नहीं था।
रामू की आठ साल की रोती हुई बेटी, गौरी, ने जब यह सुना तो उसका मासूम दिल टूट गया। वह रोती-बिलखती बीरबल के घर पहुंची और उनके पैरों में गिर गई। गौरी ने सिसकते हुए कहा, “बीरबल काका, मेरे पिता बेकसूर हैं। अगर वे चले गए, तो मैं अनाथ हो जाऊंगी। कृपया मेरे बाबूजी को बचा लीजिए।”
बीरबल की अनोखी और भावुक युक्ति
गौरी की आंखों के आंसुओं ने बीरबल के दिल को झकझोर कर रख दिया। बीरबल जानते थे कि इस बार केवल तर्क से काम नहीं चलेगा, अकबर के दिल को छूना होगा। अगली सुबह, जब रामू को फांसी के मंच पर ले जाया जा रहा था, तब बीरबल दरबार में एक सोने की डिब्बी लेकर पहुंचे।
बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह! सजा देने से पहले मेरी एक अंतिम प्रार्थना स्वीकार करें। कल रात मुझे सपने में मेरे पूर्वजों ने सोने के गेहूं का यह चमत्कारी दाना दिया है। इसे यदि सही तरीके से बोया जाए, तो पूरी फसल सोने की उगेगी। मैं चाहता हूँ कि इसे बोने की रस्म आपके हाथों संपन्न हो।”
अकबर उत्सुक हो गए। लेकिन बीरबल ने एक शर्त रख दी, “शहंशाह, इस चमत्कारी दाने को केवल वही व्यक्ति बो सकता है जिसने अपने जीवन में कभी कोई छोटी या बड़ी गलती न की हो, कभी किसी के साथ अन्याय न किया हो, और जिसके मन में कभी क्रोध न आया हो। यदि कोई अपवित्र व्यक्ति इसे छुएगा, तो यह राख बन जाएगा।”
मासूमियत की पुकार और अकबर के आंसू
अकबर ने दरबारियों की तरफ देखा, लेकिन सभी ने अपनी नजरें झुका लीं। कोई भी ऐसा नहीं था जो खुद को पूरी तरह निष्पाप कह सके। अंत में, बीरबल ने वह दाना अकबर की ओर बढ़ाया। अकबर ठिठक गए। वे जानते थे कि एक राजा होने के नाते उनसे भी कई भूलें और अन्याय हुए हैं।
अकबर ने गंभीर होकर कहा, “बीरबल, मैं भी इसे नहीं बो सकता। इंसान गलतियों का पुतला है।”
इसी पल का इंतजार कर रहे बीरबल ने कोने में खड़ी रोती हुई गौरी को आगे किया। गौरी ने अपनी डबडबाई आंखों से अकबर की ओर देखा और अत्यंत करुण स्वर में पूछा, “शहंशाह, जब इस पूरे राज्य में कोई भी ऐसा नहीं है जिसने कभी कोई गलती न की हो, तो मेरे बाबूजी से केवल एक कांच का बर्तन टूटने पर उन्हें मौत की सजा क्यों? क्या एक गरीब की जिंदगी की कीमत उस निर्जीव कांच से भी कम है?”
मासूम बच्ची के इन शब्दों ने अकबर के दिल पर सीधा वार किया। शहंशाह की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उनका अहंकार चूर-चूर हो चुका था। उन्होंने तुरंत रामू की फांसी रुकवाई और उसे गले से लगा लिया।
कहानी की सीख
यह अकबर बीरबल की चतुर कहानी हमें यह सिखाती है कि न्याय हमेशा करुणा और दया के साथ होना चाहिए। क्रोध में लिया गया फैसला हमेशा विनाशकारी होता है। इंसान गलतियों से ही सीखता है, इसलिए दूसरों को माफ करने का बड़ा दिल हमेशा रखना चाहिए।