वाह! क्या बात है! न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में बैठकर, हाथों में पांच डॉलर की लाते कॉफी थामे, जब पश्चिमी पत्रकार भारत के युवाओं की ‘आत्मा’ टटोलते हैं, तो पूरी दुनिया में ज्ञान की गंगा बहने लगती है। हाल ही में विश्वविख्यात ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक और महान आध्यात्मिक खोज की है—”भारत के युवाओं का विरोध प्रदर्शन नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी चुनौती!” यानी, हमारे देश में युवा रील्स बना रहे हों, पेपर लीक पर गुस्सा हो रहे हों या भर्ती परीक्षा के लिए लाइन में खड़े हों, न्यूयॉर्क वालों को उसमें ‘मोदी साम्राज्य का पतन’ साफ-साफ नजर आ जाता है।
मैनहट्टन के एसी कमरों से ‘क्रांति’ की पहचान
काक-वाणी के पाठकों को यह समझना होगा कि पश्चिमी मीडिया के पास एक विशेष प्रकार का ‘दूरदर्शी चश्मा’ होता है। भारत में अगर चार छात्र हॉस्टल के घटिया खाने पर भी नारे लगा दें, तो न्यूयॉर्क टाइम्स उसे “द ग्रेट इंडियन यूथ रेवोल्यूशन” घोषित कर देता है। उन्हें लगता है कि 140 करोड़ का यह देश बस उनके एक लेख का इंतजार कर रहा है, ताकि अगली सुबह सरकार गिर जाए। वाह रे पत्रकारिता! चाय की टपरी पर समोसे के साथ बहस करने वाले हमारे भारतीय युवाओं को खुद नहीं पता होता कि वे कब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों का हिस्सा बनकर ‘मोदी के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बन चुके हैं।
हर चुनाव से पहले ‘पतन’ का वही पुराना राग
वैसे, यह कोई पहली बार नहीं है। पिछले दस सालों में न्यूयॉर्क टाइम्स ने कम से कम पचास बार मोदी जी के ‘अंतिम दिन’ गिनवा दिए हैं। कभी किसान, कभी पहलवान, कभी छात्र, तो कभी सोशल मीडिया के मीम मेकर—इनकी नजर में हर कोई बस 56 इंच का सीना नापने ही निकला है। लेकिन विडंबना देखिए, जैसे ही भारत में चुनाव के नतीजे आते हैं, अमरीकी संपादकों का यह ‘क्रांतिकारी विश्लेषण’ ईवीएम की गिनती में कहीं हवा हो जाता है। फिर ये ज्ञानी पत्रकार अगले पांच साल के लिए नया ‘संकट’ ढूंढने के काम में जुट जाते हैं।
सच तो यह है कि भारत का युवा आज रोजगार, शिक्षा और अवसरों के लिए सवाल जरूर पूछ रहा है, और पूछेगा भी। लेकिन पश्चिमी मीडिया का यह मान लेना कि हर सवाल का मतलब ‘सत्ता का तख्तापलट’ है, उनकी अपनी ही बचकानी सोच का ढोल बजाता है। खैर, न्यूयॉर्क टाइम्स के आदरणीय पत्रकारों को काक-वाणी की मुफ्त सलाह है—भारत के युवाओं को समझने के लिए कभी दिल्ली के मुखर्जी नगर या पटना के मुसल्लहपुर हाट की गलियों में आकर चाय-समोसा खाइए। मैनहट्टन में बैठकर ‘काक-दृष्टि’ लगाने से सिर्फ आपका अपना चश्मा गंदा होगा, भारत का युवा और राजनीति अपनी चाल से ही चलेंगे!
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