सुंदरवन में छाए संकट के बादल
बहुत समय पहले की बात है, सुंदरवन के घने जंगल में सारंग नाम का एक सुंदर हिरण और मंथरक नाम का एक वृद्ध कछुआ रहते थे। दोनों की मित्रता इतनी गहरी थी कि जंगल के अन्य पशु-पक्षी उनके प्रेम की मिसाल दिया करते थे। वे प्रतिदिन एक साथ बैठते, सुख-दुख की बातें करते और शाम को सरोवर के तट पर टहलते थे।
एक वर्ष जंगल में भीषण सूखा पड़ा। नदियां सूख गईं, पेड़-पौधे मुरझाने लगे और पीने के पानी की बूंद-बूंद के लिए तराही-तराही मच गई। जंगल के सभी जानवर अपने प्राण बचाने के लिए दूर स्थित एक विशाल सरोवर की ओर पलायन करने लगे।
कठिन परीक्षा की घड़ी
मंथरक बहुत बूढ़ा हो चुका था और उसकी चाल अत्यंत धीमी थी। वह जानता था कि वह इतने लंबे और कठिन रास्ते को तय नहीं कर पाएगा। उसने अपनी आंखों में आंसू भरकर सारंग से कहा, “हे प्रिय मित्र! तुम अपनी जान बचाओ और तीव्र गति से उस विशाल सरोवर की ओर भाग जाओ। मेरे कारण अपनी जीवन लीला समाप्त मत करो।”
सारंग की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली। उसने मंथरक के सिर पर अपना मुंह फेरते हुए कहा, “यदि संकट के समय मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूं, तो मेरी आत्मा मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी। सच्चा मित्र वह नहीं जो केवल सुख में साथ दे, बल्कि वह है जो मृत्यु के द्वार पर भी हाथ न छोड़े।”
शिकारी का जाल और निस्वार्थ प्रेम
सारंग ने मंथरक को साथ ले जाने का निश्चय किया। लेकिन अभी वे कुछ ही दूर चले थे कि एक निर्दयी शिकारी की आहट सुनाई दी। शिकारी ने जाल फेंककर धीमी गति से चल रहे मंथरक को बंदी बना लिया। अपने मित्र को संकट में देख सारंग का हृदय कांप उठा। उसने अपने प्राणों की परवाह किए बिना एक चतुर और भावात्मक योजना बनाई।
सारंग दौड़कर शिकारी के रास्ते में जा गिरा और ऐसा नाटक करने लगा जैसे वह प्यास से अचेत होकर मर चुका हो। शिकारी ने जब एक मोटे-ताजे हिरण को भूमि पर पड़ा देखा, तो उसके मन में लालच आ गया। उसने कछुए वाले जाल को ज़मीन पर रख दिया और हिरण को उठाने के लिए आगे बढ़ा।
त्याग और बुद्धि से विजय
जैसे ही शिकारी हिरण के पास पहुंचा, सारंग तुरंत उठ खड़ा हुआ और थोड़ा आगे भाग गया। शिकारी लालच में उसके पीछे भागा। इस बीच, मंथरक ने अपने नुकीले दांतों से जाल को काटना शुरू कर दिया और निकट स्थित एक झाड़ी के पीछे छिप गया। सारंग ने शिकारी को काफी दूर भटका दिया और फिर अपनी तेज़ गति से गायब हो गया।
जब निराश शिकारी वापस लौटा, तो उसने देखा कि जाल कटा हुआ था और कछुआ गायब था। वह अपनी किस्मत को कोसता हुआ खाली हाथ चला गया। कुछ देर बाद, दोनों मित्र सुरक्षित स्थान पर मिले और एक-दूसरे को गले लगा लिया। सारंग के त्याग और समर्पण ने दोनों के प्राण बचा लिए थे।
कहानी की सीख
नैतिक शिक्षा: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि विपत्ति के समय बुद्धि, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम से हर बड़े संकट पर विजय पाई जा सकती है। स्वार्थ का त्याग करके निभाई गई मित्रता ही जीवन का सच्चा धन है।