परिवारवाद नहीं, यह तो ‘होम डिलीवरी’ समाजवाद है, भाई साहब!

राजनीति के कुरुक्षेत्र में जब-जब ‘परिवारवाद’ पर तीर चलते हैं, तब-तब हमारे नेता ऐसे तर्क ढूंढ लाते हैं कि न्यूटन और आइंस्टीन भी अपनी कब्र में करवटें बदलने लगें। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हाल ही में ज्ञान की एक ऐसी ही नई गंगा बहाई है। उन्होंने बड़े गर्व से फरमाया कि ‘कभी-कभी परिवारवाद के भी अपने फायदे होते हैं।’ भाई वाह! इसे कहते हैं आपदा को अवसर में बदलना और परिवार के पांच सदस्यों को सीधे संसद भवन पहुंचाना।

डायनिंग टेबल पर ‘संसद’ का सत्र

अखिलेश जी का तर्क है कि उनके परिवार के पांच सांसदों ने पार्टी को मजबूत किया। अब भला इसमें गलत क्या है? सोचिए, जब देश के अन्य दलों को अपने सांसदों को एकजुट रखने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ करनी पड़ती है, तब सपा प्रमुख को सिर्फ अपने घर के डाइनिंग टेबल पर एक ‘हाई-टी’ रखनी होती है। ना पाला बदलने का डर, ना व्हिप जारी करने का झंझट। सुबह की चाय पर आलू-पूरी के साथ तय हो जाता है कि संसद में आज कौन सा मुद्दा उठाना है और रात के डिनर पर उस पर चर्चा हो जाती है। इसे कहते हैं असली ‘होम डिलीवरी समाजवाद’, जहां संसद की सदस्यता सीधे घर के पते पर डिलीवर हो जाती है!

कार्यकर्ताओं का क्या? वे तो दरी बिछाने के लिए हैं!

अब कुछ सिरफिरे लोग पूछेंगे कि सालों से धूप में पार्टी का झंडा ढोने वाले, पुलिस की लाठियां खाने वाले और जेल जाने वाले आम कार्यकर्ताओं का क्या? अरे भाई, वे तो ‘कर्मयोगी’ हैं! उनके हिस्से में तो सिर्फ ‘त्याग’ और ‘संघर्ष’ का परम पुण्य आता है। सांसद बनने का सांसारिक और थकाऊ कष्ट तो बेचारे परिवार के सदस्यों को ही उठाना पड़ता है। जनसेवा का यह कठिन मार्ग केवल यादव कुनबे के वीरों के लिए ही आरक्षित है। आखिरकार, समाजवाद का असली मतलब यही तो है – ‘सबका साथ, लेकिन टिकट सिर्फ अपने खास को’!

कॉर्पोरेट जगत के लिए नया ‘मैनेजमेंट मॉडल’

अखिलेश जी के इस क्रांतिकारी विचार से हमारे देश के कॉर्पोरेट घरानों को भी सीख लेनी चाहिए। अब से कंपनियों में योग्यता, रिज्यूमे और इंटरव्यू की बकवास बंद होनी चाहिए। सीधा नियम होना चाहिए – ‘हमारा बेटा, बहू और भतीजा ही बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में होंगे, क्योंकि इससे कंपनी की एकता बनी रहती है।’ उम्मीद है कि जल्द ही ‘परिवारवाद’ को हार्वर्ड और आईआईएम के पाठ्यक्रमों में एक ‘सफल प्रबंधन मॉडल’ के रूप में पढ़ाया जाएगा। आखिर, जब पांच सांसद घर के ही हों, तो लोकतंत्र की रक्षा घर की चारदीवारी के भीतर ही सबसे सुरक्षित रहती है!


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कागा जी