‘पुलिस से बचो, धरना दो’: पबजी भूल जाइए, भारत का नया नेशनल गेम है ‘प्रोटेस्ट-जी’!

अहा! हमारे देश के होनहार और क्रांतिकारी युवाओं को आखिरकार वह डिजिटल ट्रेनिंग मिल ही गई, जिसकी उन्हें बेरोजगारी के इस दौर में सबसे ज्यादा जरूरत थी। ‘रायटर्स’ जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की रिपोर्ट गवाही दे रही है कि भारत में इन दिनों एक नया ऑनलाइन गेम तहलका मचा रहा है। खेल का नियम बेहद सरल, ऐतिहासिक और सर्वपरिचित है—”पुलिस की लाठियों से बचो, बैरिकेड कूदो और किसी तरह धरना स्थल तक पहुँचो!”

हम तो खामखां हैरान हो रहे थे कि देश का युवा दिन-रात मोबाइल में क्या उंगलियां घिस रहा है? अरे भाई, वह तो अपनी ‘प्रोटेस्ट स्किल्स’ अपग्रेड कर रहा था! अब तक जो काम हमारे माननीय नेता सड़कों पर बिना किसी सेफ्टी गियर के युवाओं से मुफ्त में करवाया करते थे, अब उसे मोबाइल स्क्रीन पर ‘हाई-डेफिनिशन’ में खेला जा रहा है। इसे कहते हैं मेक इन इंडिया का असली डिजिटल अवतार!

लेवल 1: वॉटर कैनन से बचो, लेवल 10: एंकरों के डिबेट से भागो

सुना है इस गेम में ग्राफिक्स इतने असली हैं कि फोन की स्क्रीन से ही आंसू गैस की गंध आने लगती है और बैकग्राउंड में पुलिसिया सायरन बजता है। गेम डेवलपर का हमें कोटि-कोटि धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने हमारी रोजमर्रा की राजनीतिक नौटंकी को ‘गूगल प्ले स्टोर’ पर उतार दिया। अब किसी भी बेरोजगार युवा को नेताजी के एक बयान पर सड़क पर जाकर असली लाठियां खाने की जरूरत नहीं है। आप घर बैठे, पंखे की हवा में ‘डिजिटल सत्याग्रह’ का आनंद ले सकते हैं।

खेल के लेवल्स भी बड़े क्रांतिकारी बनाए गए हैं। शुरुआती लेवल पर सिर्फ हवलदार साहब का डंडा चमकेगा, लेकिन जैसे-जैसे आप प्रो-गेमर बनेंगे, वॉटर कैनन की बौछारें, कटीले तार और सबसे खतरनाक—टीवियों के तीखे एंकरों का माइक आपका रास्ता रोकेगा। जो खिलाड़ी इन सबको चकमा देकर धरने के टेंट में बैठकर समोसा खा ले, उसे ‘परम वीर आंदोलनकारी’ का वर्चुअल मेडल दिया जाता है।

विपक्ष के लिए वरदान और भावी नेताओं की नई भर्ती

हमें तो अंदेशा है कि आने वाले चुनावों में राजनीतिक पार्टियां रैलियों के लिए भीड़ किराए पर लाने के बजाय, इस गेम के ‘हाई-स्कॉरर’ युवाओं को सीधे अपनी पार्टी का प्रवक्ता बना लेंगी। अब नौकरी के इंटरव्यू में भी डिग्री के साथ इस गेम का रैंक कार्ड मांगा जा सकता है। नेताजी पूछेंगे—”बेटा, 100 मीटर की पुलिस बैरिकेडिंग कितने सेकंड में पार कर लेते हो?”

खैर, ‘काक-वाणी’ का मानना है कि जब तक वास्तविक सड़कों पर वादों के गड्ढे और पुलिस की लाठियाँ मौजूद हैं, तब तक इस खेल का क्रेज खत्म नहीं होने वाला। आखिर जिस देश में राजनीति ही सबसे बड़ा मनोरंजन हो, वहाँ थ्रिलर गेम खेलने के लिए किसी काल्पनिक दुनिया की जरूरत ही कहाँ है?


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी