अरे वाह! देश के आम नागरिक को भले ही यह पता न हो कि वह कितने भयंकर और ‘गहरे संकट’ में सांस ले रहा है, लेकिन ‘फ्रंटलाइन’ जैसी परम ज्ञानी पत्रिकाओं को सब खबर है। हाल ही में अंग्रेजी पत्रकारिता के इस महान मीनार ने घोषणा की है कि भारत का ‘राजनीतिक संकट’ अत्यधिक गहरा हो गया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘जनता के प्रचंड गुस्से’ का सामना करना पड़ रहा है। हम ‘काक-वाणी’ वाले तो यह सनसनीखेज खबर सुनकर डर के मारे पीपल के पेड़ की डाल से गिरते-गिरते बचे!
गुस्से की तलाश: लुटियंस की कॉफ़ी से लेकर एक्स (ट्विटर) के ट्रेंड्स तक
अब मुख्य प्रश्न यह उठता है कि यह ‘जनता का गुस्सा’ आखिरकार पाया कहाँ जाता है? यदि आप ज़मीन पर जाकर किसी चाय की टपरी पर बैठेंगे, तो आपको लोग टी-20 मैच, गर्मी के पारे या राशन की दुकान पर चर्चा करते मिलेंगे। लेकिन ‘फ्रंटलाइन’ के वातानुकूलित दफ्तरों की दूरबीन कुछ अलग ही नजारा देखती है। उनके अनुसार, देश की 140 करोड़ की आबादी रोज़ सुबह उठकर मोदी के खिलाफ गुस्से का काढ़ा पीती है। फर्क बस इतना है कि चुनाव आते ही यह ‘प्रचंड गुस्सा’ रहस्यमयी तरीके से ईवीएम के बटन पर जाकर गायब हो जाता है! यह कौन सा अलौकिक जादू है, इसे तो शायद कोई आधुनिक वैज्ञानिक भी न समझा पाए।
गहराता संकट या गहराती ‘इंटेलेक्चुअल’ पत्रकारिता?
पत्रिका के अति-गंभीर संपादकीय विश्लेषण के अनुसार, संकट इतना ‘गहरा’ है
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें