महात्मा का ‘सस्ता’ सत्य और 1.7 मिलियन डॉलर की ‘अहिंसा’!

वाह री दुनिया! और वाह रे इस दुनिया का अति-क्रूर पूंजीवाद! जो इंसान जिंदगी भर लंगोटी पहनकर ‘अपरिग्रह’ यानी संपत्ति न जोड़ने का उपदेश देता रहा, आज उसी के हाथ से लिखे कुछ फटे-पुराने पन्नों को किसी बड़े रईस ने 1.7 मिलियन डॉलर (यानी करीब 14 करोड़ रुपये) में खरीद लिया। ‘काक-वाणी’ के इस विशेष बुलेटिन में आपका स्वागत है, जहाँ हम आज बापू के ‘सस्ते’ विचारों की इस ‘महंगी’ नीलामी का उत्सव मना रहे हैं।

अपरिग्रह का ग्लोबल शोरूम: जब सादगी करोड़ों में बिकी

गांधी जी अक्सर कागज बचाने के लिए इस्तेमाल किए जा चुके लिफाफों के पीछे लिख दिया करते थे। अब सोचिए, जिस रद्दी को उन्होंने किफायत बरतने के लिए बचाया था, आज वह दुनिया के सबसे बड़े अमीरों के लिए स्टेटस सिंबल बन गई है। यह पूंजीवाद का वह तमाचा है, जिसकी गूंज से यरवदा जेल की दीवारें भी थरथरा उठी होंगी। महात्मा गांधी ने सत्य के साथ जो प्रयोग किए थे, वे तो बिल्कुल मुफ्त थे, लेकिन उनके लिखे हुए शब्द आज केवल उन लोगों की पहुंच में हैं जो बिना पलक झपकाए करोड़ों रुपये फूंक सकते हैं। क्या खूबसूरत विडंबना है! जिस अहिंसा का पाठ उन्होंने मुफ्त में पढ़ाया, उसे तिजोरी में बंद करने के लिए हिंसक रूप से अमीर होना जरूरी है।

खादी का चश्मा और चुनावी चश्मा

इधर हमारे देश के महान राजनेताओं की छाती यह सोचकर फट रही होगी कि हाय! यह खजाना हमारे हाथ से कैसे निकल गया? अगर देश के हुक्मरानों को पहले पता होता कि बापू के रद्दी कागजों की कीमत करोड़ों में है, तो अब तक साबरमती आश्रम का कोना-कोना कब का नीलाम हो चुका होता। कांग्रेस पार्टी इस पर तुरंत ‘सच्ची विरासत’ का दावा ठोकते हुए कोर्ट पहुंच जाती और रॉयल्टी मांगती। वहीं, दूसरी तरफ सत्ताधारी दल इस पर ‘डिजिटल इंडिया’ का वाटरमार्क लगाकर इसे ‘मेक इन इंडिया’ की सबसे बड़ी कामयाबी घोषित कर देता।

आज हमारे देश में गांधी जी का उपयोग केवल दो ही कामों के लिए होता है – पहला, 2 अक्टूबर को राजघाट पर श्रद्धांजलि की औपचारिकता निभाने के लिए और दूसरा, स्वच्छ भारत के विज्ञापनों में उनके चश्मे को चमकाने के लिए। उनके विचारों को तो हमने कब का वैचारिक कबाड़खाने में डाल दिया था, भला हो इन विदेशी खरीदारों का, जिन्होंने बापू के असली कबाड़ को संभालकर रखा और उसे उसकी सही ‘पूंजीवादी’ औकात दिलाई।

स्वर्ग में घूमता बापू का चरखा

स्वर्ग में बैठे बापू भी आज अपना सिर पकड़कर सोच रहे होंगे कि काश! उन्होंने अपने ऑटोग्राफ का पेटेंट करवा लिया होता, तो आज देश को विदेशी कर्ज के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। खैर, बापू के विचारों की इस आलीशान नीलामी पर ‘काक-वाणी’ बस इतना ही कह सकती है – ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, लेकिन जाते-जाते खुद बन गए करोड़ों का माल!’


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कागा जी