गंगा नदी के तट पर बसे एक शांत गाँव में देवदत्त नाम का एक वृद्ध शिल्पकार रहता था। वह माटी से ऐसी सुंदर मूर्तियाँ और दीये बनाता था कि मानो उनमें प्राण बसते हों। देवदत्त का जीवन अत्यंत साधारण था, परंतु उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति और गहराई थी। गाँव के लोग जीवन के उलझे प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए प्रायः उसके पास आते थे।
अहंकारी व्यापारी और उसकी माँग
एक दिन, नगर का सबसे धनी व्यापारी विक्रमादित्य शिल्पकार की कुटिया में आया। विक्रमादित्य के पास धन-दौलत, ऊँचे महल और अपार संपदा थी, फिर भी उसका मन अशांत रहता था। उसे अपनी हर वस्तु पर अहंकार था। उसने शिल्पकार से कहा, “हे शिल्पकार! मैं तुमसे एक ऐसी कलाकृति बनवाना चाहता हूँ जो कभी नष्ट न हो। जिसे न तो समय मिटा सके और न ही मौत छू सके। इसके बदले मैं तुम्हें इतना स्वर्ण दूँगा कि तुम्हारी आने वाली पीढ़ियाँ राज करेंगी।”
शिल्पकार देवदत्त ने व्यापारी की बात सुनकर मंद मुस्कान बिखेरी। उसने एक कोने से मिट्टी का एक छोटा सा दीया उठाया, उसमें तेल-बाती डाली और उसे जला दिया। फिर उसने वह जलता दीया सेठ के हाथों में थमाते हुए कहा, “सेठ जी, इस दीये को अपने साथ ले जाइए। यदि आप इसे पूरी रात जलता हुआ रख सके, तो मैं आपको वह अमर वस्तु बनाकर दूँगा।”
आँधी और माटी की लौ
विक्रमादित्य हँस पड़ा और दीया लेकर अपने महल की ओर चल दिया। रास्ते में अचानक मौसम बिगड़ गया। घनघोर अंधेरा छा गया और बर्फीली हवाएँ चलने लगीं। व्यापारी घबरा गया। उसने अपने महँगे रेशमी वस्त्रों से दीये की लौ को ढपने का प्रयास किया। हवा इतनी तेज़ थी कि सेठ का शरीर काँपने लगा और उसके हाथ जलने लगे, लेकिन उसने दीये को बुझने नहीं दिया।
उस भयानक अंधेरे में, उस छोटे से माटी के दीये की नन्ही सी लौ ने व्यापारी को मार्ग दिखाया। व्यापारी ने देखा कि दीया हवा के थपेड़ों से धीरे-धीरे टूट रहा था, लेकिन वह अंत तक प्रकाश बिखेरता रहा। उस पल सेठ के हृदय में एक गहरा परिवर्तन हुआ। उसकी आँखें छलक आईं। उसने महसूस किया कि लोहे या सोने की कठोरता में वह सुंदरता नहीं है, जो माटी के इस नश्वर दीये के त्याग और समर्पण में थी।
जीवन का परम सत्य
अगली सुबह विक्रमादित्य भावुक होकर शिल्पकार की कुटिया में पहुँचा। उसने दीये के अवशेष शिल्पकार के चरणों में रख दिए और कहा, “बाबा! मैं समझ गया। इस संसार में कुछ भी अमर नहीं है। मेरा धन, मेरा महल, मेरा शरीर—सब एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा।”
देवदत्त ने व्यापारी को उठाकर गले लगाया और कहा, “यही जीवन का परम सच है। जीवन का मूल्य इसमें नहीं कि हम कितना जीते हैं या कितना धन संचित करते हैं, बल्कि इसमें है कि जब तक जीते हैं, दूसरों के जीवन में कितना प्रकाश फैलाते हैं। नश्वरता को स्वीकार करना ही शांति का मार्ग है।”
कहानी की सीख (Moral): जीवन का सबसे बड़ा सच यह है कि यह शरीर और भौतिक संपत्ति क्षणभंगुर हैं। अहंकार और धन-संग्रह में जीवन व्यर्थ करने की बजाय, हमें प्रेम, करुणा और सेवा के माध्यम से दूसरों के जीवन को रोशन करना चाहिए।