अहा! क्या अद्भुत और ऐतिहासिक दिन है! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ठेका अपने पास रखने वाले अमेरिकी चाचाओं को आखिरकार समझ आ ही गया कि दुनिया में ‘आंतरिक मामला’ नाम की भी कोई चीज़ होती है। अमेरिकी नेता मार्को रुबियो साहब ने भारत के चुनाव आयोग और विपक्ष के विरोध-प्रदर्शन के बवंडर को भारत का ‘आंतरिक राजनीतिक मामला’ घोषित कर दिया है। काक-वाणी की पूरी टीम इस ज्ञानोदय पर वाशिंगटन की तरफ मुँह करके तालियाँ बजा रही है।
जब लोकतंत्र के ठेकेदार को ‘संयम’ का दौरा पड़ा
वैसे अमेरिका की पुरानी आदत रही है कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर कोई चींटी भी फिसल जाए, तो वे तुरंत अपनी ‘लोकतंत्र बचाओ’ ब्रिगेड और मानवाधिकारों की फाइलें लेकर पहुँच जाते हैं। लेकिन इस बार रुबियो साहब को अचानक दिव्य ज्ञान हुआ कि नहीं भाई, भारत के चुनाव आयोग के बाहर कौन सा नेता झंडा लहरा रहा है और कौन नारा लगा रहा है, इसमें वाशिंगटन को अपनी नाक घुसाने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा लगता है कि रुबियो साहब ने भारतीय न्यूज़ चैनलों की डिबेट्स ज़्यादा गंभीरता से देख ली हैं और समझ गए हैं कि यहाँ मुफ़्त की सलाह देने पर कितना भारी जुर्माना (ट्विटर ट्रेंड्स के रूप में) भरना पड़ सकता है!
‘यूएन विशेषज्ञ’ यानी धरती का सबसे बड़ा विरोधाभास?
सहानुभूति का यह ज्ञान यहीं समाप्त नहीं हुआ। रुबियो साहब ने एक और ज़बरदस्त गोला दागा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों को सीधा ‘ऑक्सीमोरोन’ यानी एक स्वविरोधी शब्द बता दिया। यानी उनके हिसाब से ‘यूएन’ और ‘एक्सपर्ट’ एक साथ ऐसे ही लगते हैं जैसे ‘ईमानदार नेता’ या ‘शाकाहारी मटन’। वैसे देखा जाए तो रुबियो साहब ने बात तो पते की कही है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ न्यूयॉर्क के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसी रिपोर्टें बनाते हैं जिनका ज़मीनी हक़ीक़त से उतना ही लेना-देना होता है जितना आम जनता का नेताओं के वादों से।
विदेशी ‘सर्टिफिकेट’ का देसी मोह
अब ज़रा हमारे देश की राजनीति का रंग देखिए। जब यही यूएन भारत के ख़िलाफ़ कुछ बोलता है, तो सत्ता पक्ष इसे ‘अंतरराष्ट्रीय साज़िश’ बताकर ख़ारिज कर देता है और विपक्ष इसे ‘अंतिम सत्य’ मानकर ढोल बजाने लगता है। लेकिन जैसे ही मार्को रुबियो जैसे किसी अमरीकी ‘गोरे साहब’ ने पक्ष में बयान दे दिया, सत्ता पक्ष इसे ‘वैश्विक मुहर’ मानकर इतराने लगा है। सच तो यह है कि हमें ‘विश्वगुरु’ बनने के लिए भी अंततः किसी अमेरिकी सीनेटर के थप्पकी की ही ज़रूरत महसूस होती है!
काक-वाणी का तो बस इतना ही कहना है—रुबियो साहब, आपकी इस ‘उदारता’ का बहुत-बहुत शुक्रिया! लेकिन ज़रा संभलकर रहिएगा, कहीं आपके इस बयान से नाराज़ होकर यूएन के ‘विशेषज्ञ’ अमरीकी नेताओं के विवेक पर ही कोई 500 पन्नों की नई रिपोर्ट तैयार न कर दें!
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