राहुल की ‘चिंता’ बनाम मोदी की ‘बात’: जब कानों को मिला काम और जुबान को आराम!

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया और बेहद क्रांतिकारी आविष्कार हुआ है – ‘सुनना’। जी हाँ, अब तक हमारे देश के नेता सिर्फ बोलना जानते थे, लेकिन कांग्रेस ने दावा किया है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का मकसद लोगों को अपनी ‘मन की बात’ सुनाना नहीं, बल्कि जनता की ‘चिंता’ सुनना था। यह सुनकर हमारे ‘काक’ को विश्वास ही नहीं हो रहा कि कोई राजनेता बिना माइक के, सिर्फ कान खोलकर भी घूम सकता है! आखिर भारतीय राजनीति में बिना ‘प्रवचन’ दिए कोई कैसे रह सकता है?

जब प्रवचन के बाजार में ‘श्रवण कुमार’ उतरे!

कांग्रेस के इस बयान ने देश की राजनीतिक मंडली में खलबली मचा दी है। अब तक तो नियम यही था कि नेताजी मंच पर आएंगे, दहाड़ेंगे, अपने ‘मन की बात’ कहेंगे और फिर जनता चुपचाप ताली बजाकर अपने घर लौट जाएगी। लेकिन राहुल बाबा ने इस स्थापित परंपरा को तोड़ दिया। उन्होंने सोचा कि जब देश में बोलने वालों की बाढ़ आई हुई है, तो चलो थोड़ा सुन ही लिया जाए। वैसे भी, विपक्ष में रहकर सुनने के अलावा और किया भी क्या जा सकता है? सत्तापक्ष वैसे भी उनकी संसद में नहीं सुनता, तो राहुल जी ने सोचा कि चलो सड़क पर जनता के दुखड़े ही सुन लेते हैं!

पैदल चलने का दर्द और कानों का फर्ज

हजारों किलोमीटर पैदल चलकर जनता की चिंता सुनना कोई मामूली बात नहीं है। इसके लिए मजबूत पैरों के साथ-साथ बहुत धैर्यवान कानों की भी जरूरत होती है। अब सोचिए, पूरे रास्ते लोग अपनी महंगाई, बेरोजगारी और ‘आलू से सोना’ न बन पाने की समस्याएं सुना रहे थे, और हमारे राहुल जी गंभीर चेहरा बनाकर कह रहे थे, “मैं महसूस कर सकता हूँ।” यह देखना वाकई दिलचस्प था कि जो पार्टी दशकों तक सत्ता में रहकर ‘जनता की आवाज’ को अनसुना करने के लिए मशहूर थी, वह अचानक ‘कानों का डॉक्टर’ बनकर घूम रही है।

क्या सुनने से पेट भरेगा और वोट मिलेगा?

राजनीति के इस नए ‘श्रवण युग’ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ सुनने से ईवीएम (EVM) का बटन दबेगा? भाजपा वाले तो अपनी ‘मन की बात’ का एकतरफा प्रसारण करके भी चुनाव जीत जाते हैं, और यहाँ कांग्रेस सिर्फ ‘चिंता’ का बंडल बटोरकर ही गदगद है। काक-वाणी का तो यही मानना है कि ‘मन की बात’ एकतरफा रेडियो स्टेशन है, तो ‘जनता की चिंता’ एक ऐसा हेडफोन है जिसमें सिर्फ दर्द भरा संगीत बजता है। अब देखना यह है कि जनता की इस ‘चिंता’ को सुनने के बाद कांग्रेस के अपने ‘चिंतन’ में कोई सुधार आता है, या फिर वे अगली यात्रा के लिए नए जूते खरीदने की तैयारी में जुट जाते हैं!


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कागा जी