राहुल गांधी की ‘मुफ़्त बस यात्रा’ और लोकतंत्र का नया एडवेंचर

वाह! क्या अद्भुत नज़ारा है। भारतीय लोकतंत्र का वह शाश्वत नियम एक बार फिर चरितार्थ हुआ, जहां विपक्ष की ‘मांग’ बाद में उठती है और दिल्ली पुलिस की सरकारी बस पहले आकर खड़ी हो जाती है। हमारे परम आदरणीय जननेता राहुल गांधी एक बार फिर देश को बचाने निकले थे। इस बार उनका निशाना कोई छोटा-मोटा विभाग नहीं, सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार साहब थे। राहुल जी का नारा था- ‘इस्तीफ़ा दो!’ लेकिन दिल्ली पुलिस ने बड़े प्यार से कहा- ‘पहले हमारे साथ बस में बैठो, ज़रा दिल्ली दर्शन तो करो!’

‘हिरासत’ या वीआईपी टूरिस्ट पैकेज?

आजकल विपक्ष का नेता होना किसी रोमांचक ‘एडवेंचर स्पोर्ट्स’ से कम नहीं है। आपको घर पर बोर होने की कतई ज़रूरत नहीं है। बस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कीजिए, किसी बड़े अधिकारी के इस्तीफ़े की मांग कीजिए, और तुरंत आपके दरवाज़े पर ‘अतिथि देवो भव:’ का बोर्ड लगाए दिल्ली पुलिस हाजिर हो जाएगी। राहुल गांधी ने जैसे ही ईवीएम और सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोला, पुलिस ने ‘त्वरित सेवा’ का प्रदर्शन करते हुए उन्हें हिरासत में ले लिया। ‘काक-वाणी’ का मानना है कि यह हिरासत नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रायोजित एक ‘फ्री वीआईपी राइड’ है, जिसका आनंद केवल भाग्यशाली नेताओं को ही मिलता है।

ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा और पुलिस की मुस्तैदी

यह देखना वाकई दिलचस्प है कि देश में किसी घोटाले पर कार्रवाई भले ही कछुए की गति से हो, लेकिन विपक्ष के मार्च को रोकने में पुलिस की गति ‘सुपरसोनिक’ हो जाती है। उधर सीईसी साहब अपने वातानुकूलित दफ़्तर में बैठकर फाइलों पर दस्तखत कर रहे होंगे, और इधर राहुल जी सड़क पर धूप में पसीना बहा रहे थे। वैसे, बीबीसी ने इस खबर को ऐसे दिखाया जैसे दिल्ली में कोई ‘क्रांति’ हो गई हो। अरे भाई, यह तो हमारे यहां का साप्ताहिक पारिवारिक आयोजन है। राहुल जी मांग करेंगे, पुलिस रोकेगी, दोनों तरफ से तस्वीरें खिंचेंगी, और शाम को सब अपने-अपने घर जाकर आराम से डिनर करेंगे।

इस पूरे ड्रामे से एक बात तो साफ़ है कि भारत में लोकतंत्र बिल्कुल सुरक्षित है, खासकर पुलिस थानों के अंदर। राहुल जी को हमारी सलाह है कि अगली बार इस्तीफ़े की मांग करने से पहले अपनी जेब में कुछ स्नैक्स ज़रूर रख लें, क्योंकि दिल्ली पुलिस की मेहमाननवाज़ी में चाय तो मिल जाती है, लेकिन समोसे के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ता है!


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कागा जी