लोकतंत्र का ‘सच्चा’ दीक्षांत समारोह: जब मुकदमों की संख्या तय करे आपकी योग्यता!

काक-वाणी: दाग अच्छे हैं, क्योंकि दागों से ही संसद के ‘टिकट’ मिलते हैं!

वाह री हमारी भारतीय जम्हूरियत! हम साधारण नागरिक तो एक छोटी सी ट्रैफिक चालान की रसीद कटने पर भी सरकारी नौकरी के सपने देखना छोड़ देते हैं। चरित्र प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिस जाती हैं। लेकिन हमारे देश के कर्णधारों का दिल बहुत बड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के सामने आई ताजा रिपोर्ट ने दिल बाग-बाग कर दिया है। रिपोर्ट चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि हमारे देश की संसद और विधानसभाओं में कोई ऐरे-गैरे लोग नहीं बैठे हैं। वहां 326 सांसद और 14 मुख्यमंत्री ऐसे विराजमान हैं, जिन्होंने कानून की किताबों के पन्नों को केवल पढ़ा नहीं है, बल्कि उन्हें जीया है! कुल मिलाकर 4,000 से अधिक आपराधिक मामले! इसे कहते हैं ‘अनुभवी’ और ‘जमीनी’ नेतृत्व।

योग्यता का नया पैमाना: आईपीसी की धाराएं

जनता अक्सर यह भूल जाती है कि राजनीति में आने के लिए किसी विश्वविद्यालय की डिग्री की नहीं, बल्कि असली ‘दबंगई’ की जरूरत होती है। अब जिसके पास एफआईआर (FIR) की जितनी लंबी सूची होगी, उसका राजनीतिक बायोडाटा उतना ही मजबूत माना जाएगा। आखिर जो नेता खुद पुलिस और कानून की धाराओं से न डरा हो, वह भला जनता के दुश्मनों से क्या डरेगा? जनता को भी तो ऐसे ही ‘रॉबिनहुड’ पसंद हैं जो कानून को अपनी जेब में लेकर घूमते हों। सुप्रीम कोर्ट भले ही इस आंकड़े को देखकर चिंता में माथा पीट रहा हो, लेकिन राजनीतिक दलों के दफ्तरों में तो इस वक्त जश्न का माहौल होगा कि उनके चुने हुए सूरमा कितने ‘सक्षम’ और ‘प्रभावशाली’ हैं।

कानून निर्माताओं का ‘कानूनी’ अनुभव

सोचिए, जो लोग देश के लिए कानून बनाते हैं, वे खुद अदालतों के चक्कर लगाने के सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं। इससे बेहतर न्यायशास्त्र का व्यावहारिक ज्ञान और किसे हो सकता है? ये माननीय दिन में संसद में बैठकर कानून बनाते हैं और शाम को अपने मुकदमों की पैरवी की रणनीति तैयार करते हैं। इसे कहते हैं चौबीस घंटे देश की सेवा में समर्पित रहना। 14 मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले होना यह साबित करता है कि राज्य का मुखिया बनने के लिए ‘विशेष प्रशासनिक योग्यता’ की आवश्यकता होती है, जिसमें कानूनी पचड़ों से कुशलतापूर्वक निपटना सबसे पहली शर्त है।

अंत में, ‘काक-वाणी’ तो यही कहेगी कि जब तक जनता ‘बाहुबलियों’ के आगे नतमस्तक होती रहेगी और राजनीतिक दल ‘जिताऊ उम्मीदवार’ के नाम पर दागियों को गले लगाते रहेंगे, तब तक सुप्रीम कोर्ट की ये चिंताएं केवल फाइलों की शोभा बढ़ाएंगी। नेताओं के चेहरे पर लगे ये दाग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का वो ‘मेकअप’ हैं, जिसके बिना हमारी राजनीति अधूरी है। अगली बार जब आप वोट देने जाएं, तो उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता नहीं, बल्कि उसके मुकदमों का ‘शानदार स्कोरकार्ड’ जरूर देख लें!</p


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कागा जी