अरे भाई! भारत में अगर किसी का समोसा ठंडा निकल जाए या चाय में चीनी कम हो, तो वह भी सीधे चुनाव आयोग की तरफ मार्च करने की सोचता है। हालिया खबर DW.com की कृपा से आई है कि हमारे परम पूज्य और ‘अत्यंत निष्पक्ष’ मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार साहब के इस्तीफे के लिए प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। काक-वाणी की नज़र से देखें तो यह लोकतंत्र का कोई नया संकट नहीं, बल्कि हमारे देश का सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा ‘संडे-पासटाइम’ है।
ज्ञानेश कुमार जी की क्या खता, आयोग तो बस ‘मौनव्रत’ में है!
अब सवाल यह उठता है कि प्रदर्शनकारियों को ज्ञानेश कुमार जी से आखिर दिक्कत क्या है? क्या उन्होंने विपक्ष की शिकायतों पर बहुत जल्दी एक्शन ले लिया, या सत्ता पक्ष के बयानों को बिना पढ़े ही ‘ऑल ओके’ का ठप्पा लगा दिया? लोकतंत्र के इस पावन मंदिर में चुनाव आयोग का काम केवल चुनाव कराना नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों से गालियां खाना और वक्त आने पर ‘हम मामले की जांच कर रहे हैं’ वाला टेप रिकॉर्डर बजाना है। ज्ञानेश जी शायद इस कला में इतने निपुण हो चुके हैं कि अब जनता को उनका इस्तीफा ही एकमात्र मनोरंजन लग रहा है।
मार्च का असली मक़सद: कसरत या लोकतंत्र की चिंता?
चुनाव आयोग के दफ़्तर तक की यह पैदल यात्रा (मार्च) बेहद स्वास्थ्यवर्धक है। विपक्ष के नेताओं और उनके उत्साही कार्यकर्ताओं के लिए यह एक बेहतरीन ‘कार्डियो वर्कआउट’ साबित हो रहा है। चुनाव हारने का गम भुलाने और शाम की टीवी डिबेट्स में जगह पाने का इससे सस्ता और टिकाऊ तरीका भला क्या हो सकता है? प्रदर्शनकारियों को लगता है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा आते ही देश की सारी ईवीएम (EVM) रातों-रात ईमानदारी की मूरत बन जाएंगी और उनमें से कमल या हाथ के बजाय रसगुल्ले निकलने लगेंगे।
काक-वाणी का निष्पक्ष ज्ञान
काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि हमारे देश में इस्तीफा मांगना एक मौसमी त्यौहार की तरह है। जब तक हार का ठीकरा फोड़ने के लिए चुनाव आयोग मौजूद है, तब तक किसी नेता को अपनी रणनीतियों पर विचार करने की जरूरत ही नहीं है। ज्ञानेश कुमार जी, आप बिल्कुल मत घबराइए। आराम से अपनी एसी केबिन में बैठकर चाय की चुस्कियां लीजिए और दफ़्तर के बाहर बजते नारों को ‘लोकतंत्र का संगीत’ समझकर मुस्कुराते रहिए, क्योंकि यहाँ आयुक्त बदलते हैं, लेकिन शिकायत का ड्रामा कभी नहीं बदलता!
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