विदेशी ‘साज़िश’ का भूत और भारतीय लोकतंत्र का ‘ओपन’ थिएटर

अहा! ‘ओपन मैगजीन’ ने एक बार फिर से एक महान ‘अंतरराष्ट्रीय खुलासा’ कर दिया है। ‘रजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का भूत एक बार फिर भारत के आकाश में मँडरा रहा है। काक-वाणी के चश्मे से देखें तो यह खबर सुनकर देश के महान नेताओं की नींद उड़ने के बजाय सुबह की चाय का स्वाद और बढ़ गया है। आख़िरकार, जब तक राजनीति में ‘विदेशी हाथ’ और ‘अदृश्य साज़िश’ का तड़का न लगे, तब तक भारतीय लोकतंत्र की दाल में असली स्वाद ही कहाँ आता है?

सत्ता परिवर्तन का खौफ या टीआरपी का नया नुस्खा?

खबरों का बाज़ार गर्म है कि कोई अदृश्य विदेशी शक्ति भारत में चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने की फिराक में है। सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ताओं को तो मानो ईश्वरीय वरदान मिल गया हो! अब देश में सड़क के हर गड्ढे, महँगाई के हर आँकड़े और हर छोटे-मोटे आंदोलन के पीछे जॉर्ज सोरोस या किसी ‘टूलकिट’ का हाथ घोषित करना कितना सुविधाजनक हो गया है। अगर किसी नेता की चाय में चीनी कम हो जाए, तो मान लीजिए कि इसमें भी किसी विदेशी एजेंसी की ही गहराई से रची गई साज़िश है! सत्ता में बने रहने का यह सबसे सुरक्षित कवच है—’हम तो दिन-रात विकास कर रहे थे, लेकिन विदेशी ताकतों ने हमारे लोकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया।’

लोकतंत्र बचाने का ‘पार्ट-टाइम’ कारोबार

दूसरी तरफ़, हमारे विपक्षी दल के सूरमा हैं, जो इस ‘रजीम चेंज’ की थ्योरी को सुनकर मन ही मन घी के दीये जला रहे हैं। उन्हें लगता है कि जनता के बीच जाकर पसीना बहाने की क्या ज़रूरत है, जब कोई विदेशी मैगजीन या अचानक भड़का हुआ आंदोलन ही उनके लिए सत्ता की कुर्सी का रास्ता साफ़ कर देगा? चुनाव हारने पर ईवीएम को कोसना और फिर किसी विदेशी रिपोर्ट को पकड़कर ‘लोकतंत्र की हत्या’ का रोना रोना—यह इनका पसंदीदा पार्ट-टाइम धंधा बन चुका है। आज के दौर में धरना-प्रदर्शन जनहित के लिए कम और सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने के लिए ज़्यादा किए जाते हैं।

सच तो यह है कि भारत का लोकतंत्र इतना कागज़ी नहीं है कि किसी मैगजीन के पन्नों या दो-चार प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों से उखड़ जाए। यहाँ लोकतंत्र का असली उत्सव तो चुनाव के समय मुफ़्त की योजनाओं, जातिगत गणित और नेताओं के लच्छेदार जुमलों से जमता है। ‘काक-वाणी’ का सीधा मानना है कि ‘रजीम चेंज’ का यह प्रेत केवल दिल्ली के महंगे ड्राइंग रूम्स और टीवी स्टूडियो के एसी कमरों में ही भटकता है। आम जनता को इस ‘ग्रैंड ड्रामे’ से कोई फर्क नहीं पड़ता, वह तो बस इस फिराक में है कि अगली बार किसका मुफ़्त राशन या मुफ़्त बिजली का वादा ज़्यादा मज़बूत है!


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कागा जी