शोक सभा में ‘नो एंट्री’: जब पंजाब के ग्रामीणों ने छीन लिया नेताओं का ‘आपदा में अवसर’

भारत के लोकतंत्र में सबसे बड़ा मानवाधिकार क्या है? मुफ्त राशन? अभिव्यक्ति की आजादी? जी नहीं, सबसे बड़ा अधिकार है – किसी की मौत पर राजनीति करने का पावन अधिकार। लेकिन पंजाब के एक गांव वालों ने इस पवित्र अधिकार पर जो डाका डाला है, उससे हमारे नेताओं के संवेदनशील दिलों पर गहरी चोट पहुंची है। एक गरीब ने आत्महत्या क्या की, हमारे नेता अपनी सफेद गाड़ियों का काफिला लेकर ‘शोक पर्यटन’ पर निकलने ही वाले थे कि ग्रामीणों ने ‘रास्ता बंद है’ का बोर्ड लगा दिया।

शोक पर्यटन और कैमरे की बेबसी

अब आप ही बताइए, बिना कैमरामैन और मीडिया बाइट्स के किसी की मौत पर दुख कैसे जताया जा सकता है? क्या आंसू बिना फ्लैशलाइट के गिर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। जैसे ही खबर आई कि पंजाब में एक व्यक्ति ने दम तोड़ दिया, नेताओं के दिल में तुरंत ‘सहानुभूति’ का ज्वार उमड़ पड़ा। सफेद कुर्ते-पायजामे पर इस्त्री करवाई गई, चेहरों पर ‘गंभीर और दुखी’ दिखने का अभ्यास किया गया, और गाड़ियों के टायर चमकाए गए। लेकिन ग्रामीणों ने सारा खेल बिगाड़ दिया। उन्होंने नेताओं को गांव की सीमा पर ही रोक दिया।

ग्रामीणों की यह ‘गुस्ताखी’ और लोकतंत्र का संकट

यह सीधे-सीधे लोकतंत्र की हत्या है! ग्रामीण भला यह कैसे तय कर सकते हैं कि उन्हें किसका दुख स्वीकार करना है और किसका नहीं? नेताओं का तो पेशा ही यही है। फसल खराब हो, तो नेता; बाढ़ आए, तो नेता; और यदि कोई आत्महत्या कर ले, तो सांत्वना देने का पहला कॉपीराइट तो नेताओं का ही बनता है। ग्रामीणों ने भाजपा नेताओं को रोककर न केवल उनके कर्तव्यों में बाधा डाली, बल्कि उस कैमरे का भी अपमान किया जो दो बूंद आंसू कैद करने के लिए सुबह से चार्ज हो रहा था।

काक-वाणी के गुप्त सूत्रों के अनुसार, कई नेता इस बात से बेहद आहत हैं कि वे इस दुखद घटना का इस्तेमाल विपक्ष पर हमला करने के लिए नहीं कर पाए। “अगर हमें रोने ही नहीं दिया जाएगा, तो हम चुनाव कैसे लड़ेंगे?” – एक भावुक नेताजी ने नाम न छापने की शर्त पर सिसकते हुए पूछा।

राजनीति का नया प्रोटोकॉल

अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग एक नया नियम बनाए। किसी भी दुखद घटना के बाद, नेताओं के लिए ‘वीआईपी एंट्री’ सुरक्षित होनी चाहिए। ग्रामीणों को यह समझना होगा कि जनता का काम सिर्फ मरना है, उस पर शोक मनाकर वोट बटोरना तो हमारे जनसेवकों का विशेषाधिकार है। पंजाब के ग्रामीणों की इस ‘अलोकतांत्रिक’ हरकत की ‘काक-वाणी’ घोर निंदा करता है। आखिर, नेताओं के आंसुओं की भी कुछ कीमत होती है, भाई साहब!


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कागा जी