एक अनोखा परिवार और अटूट विश्वास
बहुत समय पहले की बात है, एक सुंदर और शांत गाँव में देवदत्त नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी करुणा और नन्हे बेटे के साथ रहता था। उसी घर में ‘नीलू’ नाम का एक वफादार नेवला भी रहता था। देवदत्त को वह नेवला जंगल में लावारिस हालत में मिला था। करुणा ने उसे अपने बच्चे की तरह ही दूध पिलाकर पाला था। नेवला और ब्राह्मण का बेटा एक साथ बड़े हो रहे थे। नीलू के मन में उस परिवार के प्रति अगाध प्रेम और वफादारी थी। वह हमेशा साए की तरह बच्चे की रक्षा करता था।
परिस्थिति की परीक्षा
एक दोपहर, देवदत्त किसी काम से बाहर गया हुआ था। करुणा को भी पास के कुएं से पानी लेने जाना था। बच्चा पालने में गहरी नींद सो रहा था। करुणा ने नीलू की तरफ देखा, जो पालने के पास बैठा था। उसने नीलू से कहा, “नीलू, मैं पानी लेने जा रही हूँ। मेरे बच्चे का ध्यान रखना।” नीलू ने अपनी समझदार आँखों से हामी भरी। करुणा घड़ा लेकर चली गई। कुछ ही देर बाद, एक जहरीला काला नाग कहीं से रेंगता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। वह सीधे बच्चे के पालने की ओर बढ़ रहा था। नीलू की नजर उस काल पर पड़ी। अपने भाई समान बच्चे की रक्षा के लिए नीलू तुरंत उस सांप पर झपट पड़ा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः, अपनी जान की बाजी लगाकर नीलू ने सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
एक भयानक भूल और विनाश
सांप को मारने के बाद, नीलू का मुंह और पंजे खून से सने हुए थे। वह खुशी से झूम उठा कि उसने अपने छोटे मालिक की जान बचाई है। जब उसने बाहर करुणा के कदमों की आहट सुनी, तो वह अपनी वफादारी का पुरस्कार पाने और अपनी मालकिन को अपनी जीत दिखाने के लिए दौड़कर दरवाजे पर आ गया। करुणा जैसे ही पानी का घड़ा लेकर लौटी, उसने नीलू के मुंह पर खून लगा देखा। वह बुरी तरह डर गई। उसके दिमाग में पहला विचार आया कि इस जंगली जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है। क्रोध, भय और बिना सोचे-समझे, करुणा ने पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से नीलू के ऊपर दे मारा। घड़े के भारी प्रहार से बेकसूर नीलू ने तड़प-तड़पकर वहीं दम तोड़ दिया।
पछतावे के आंसू
करुणा रोती-बिलखती हुई घर के भीतर भागी। लेकिन अंदर का नजारा देखकर उसके पैर सुन्न पड़ गए। उसका बच्चा पालने में चैन से सो रहा था और मुस्कुरा रहा था। पालने के ठीक नीचे एक विशाल काला सांप लहूलुहान मरा पड़ा था। करुणा को तुरंत पूरी सच्चाई समझ आ गई। नीलू ने तो उसके बच्चे की जान बचाई थी, और उसने बदले में अपने उस वफादार बेटे समान नेवले को मार डाला। करुणा नीलू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका अनमोल और सच्चा मित्र हमेशा के लिए सो चुका था।
कहानी की सीख
सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ‘बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय’। क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय हमेशा विनाश का कारण बनता है। किसी भी परिस्थिति में सच जाने बिना कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, अन्यथा जीवनभर का पछतावा ही हाथ लगता है।