सुंदरवन के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक बूढ़ा किसान रहता था। रामू का इस दुनिया में कोई नहीं था। वह दिन-भर खेतों में मेहनत करता और रात को अपनी सूनी झोपड़ी में लौट आता। एक शाम, जब वह थका-हारा खेत से लौट रहा था, तो उसे झाड़ियों में दर्द से कराहने की आवाज़ सुनाई दी। पास जाकर देखने पर उसे एक घायल सारस मिला, जिसका पंख किसी शिकारी के तीर से टूट चुका था और वह तड़प रहा था।
एक अनमोल रिश्ता
रामू का संवेदनशील हृदय पसीज गया। वह उस बेज़ुबान पक्षी को अपनी झोपड़ी में ले आया। उसने बड़ी कोमलता से उसका तीर निकाला, घाव पर जड़ी-बूटियाँ लगाईं और उसे दाना-पानी दिया। रामू ने उसका नाम ‘चीकू’ रखा। कई हफ़्तों की देखभाल के बाद चीकू का घाव तो ठीक हो गया, लेकिन उसने रामू का साथ छोड़ने से मना कर दिया। चीकू अब रामू के साथ ही रहता, उसके साथ खेत पर जाता और शाम को घर लौटता। गाँव के लोग रामू का मज़ाक उड़ाते हुए कहते, “रामू, यह सिर्फ एक पक्षी है। जिस दिन इसके पंखों में ताकत आएगी, यह उड़ जाएगा।” लेकिन रामू मुस्कुराकर कहता, “प्यार की भाषा इंसान और जानवर दोनों समझते हैं।”
विपत्ति की वह भयानक रात
समय बीतता गया और दोनों का रिश्ता और गहरा हो गया। एक रात, गाँव में मूसलाधार बारिश शुरू हुई। देखते ही देखते पास की नदी उफान पर आ गई और बाढ़ का पानी गाँव में घुसने लगा। रामू अपनी ढलती उम्र और गठिया के दर्द के कारण तेज़ी से भाग नहीं सका। अचानक उसकी झोपड़ी की एक भारी लकड़ी की शहतीर उसके पैर पर गिर गई। वह मलबे के नीचे दब गया और बाढ़ का पानी उसकी छाती तक पहुँचने लगा। चीकू अपनी जान बचाने के लिए उड़ सकता था, लेकिन उसने अपने रक्षक को इस हाल में तड़पते देखा, तो वह व्याकुल हो उठा।
चीकू का अंतिम बलिदान
चीकू ने अपनी पूरी ताकत से रामू को खींचने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। समय बहुत कम था। चीकू तुरंत तूफ़ान के बीच उड़ गया। वह गाँव के उन युवकों के घरों की खिड़कियों पर जाकर अपनी चोंच मारने लगा जो राहत कार्य में जुटे थे। उसने अपनी चीखों से इतना शोर मचाया कि युवक चौंक गए। चीकू बार-बार उड़कर रामू की झोपड़ी की तरफ जाता और वापस आता। युवकों को समझ आ गया कि कुछ अनहोनी हुई है। वे चीकू के पीछे-पीछे भागे।
युवकों ने समय रहते मलबे को हटाकर रामू को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। लेकिन जैसे ही रामू को बाहर निकाला गया, झोपड़ी की बची हुई मिट्टी की दीवार अचानक भरभराकर ढह गई। चीकू, जो रामू के बिल्कुल करीब उड़ रहा था, उस भारी मलबे की चपेट में आ गया। रामू ने रोते हुए चीकू को मलबे से निकाला। चीकू की आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में अपने रक्षक को सुरक्षित देखने का एक असीम संतोष था। रामू की गोद में ही चीकू ने अपनी अंतिम साँस ली।
कहानी की सीख
यह पंचतंत्र की नैतिक कहानी हमें यह सिखाती है कि: निस्वार्थ भाव से किया गया उपकार और प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता। संवेदना और वफादारी केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं हैं; बेज़ुबान जानवर भी प्रेम का ऋण चुकाना जानते हैं और संकट के समय सच्चे मित्र साबित होते हैं।