सोनिया गांधी की बायोग्राफी पर लगा ‘मौन ब्रेक’: पेंगुइन के पसीने और ‘विशेष मुद्दे’ का रहस्य!

भारत की राजनीति में ‘मौन’ का अपना ही एक समृद्ध और ऐतिहासिक महत्व रहा है। जब देश की सबसे ताकतवर ‘सुपर पीएम’ की जीवनी छपने की बात हो, और उस पर भी ‘मौन’ का ग्रहण लग जाए, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही कोयले की खदान से निकली है। डेक्कन हेराल्ड की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पेंगुइन इंडिया ने सोनिया गांधी के बहुप्रतीक्षित संस्मरण (Memoir) के रुकने के पीछे एक ‘विशेष मुद्दे’ (particular issue) का हवाला दिया है। अब इस ‘विशेष मुद्दे’ को लेकर देश के बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित रात-भर सो नहीं पा रहे हैं।

ये ‘विशेष मुद्दा’ आखिर क्या है, भैया?

काक-वाणी के गुप्त सूत्रों (जो उतने ही विश्वसनीय हैं जितनी कांग्रेस की चुनावी भविष्यवाणियां) का मानना है कि यह ‘विशेष मुद्दा’ कुछ और नहीं, बल्कि सत्य को सहेजने की कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। क्या यह मुद्दा ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाने की गुप्त रेसिपी का लीक होना है? या फिर इसमें उस ‘अंतरआत्मा की आवाज’ का डिकोडेड वर्जन है, जिसने २००४ में प्रधानमंत्री पद को ठुकरा कर सबको चौंका दिया था? पेंगुइन इंडिया बेचारा परेशान है। वे सोच रहे थे कि एक शानदार किताब छापकर मोटी कमाई करेंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यहाँ तो पन्नों से ज्यादा भारतीय राजनीति की स्याही गाढ़ी और जिद्दी है।

पेंगुइन का यू-टर्न और राजनीति का हाई-वोल्टेज ड्रामा

जैसे ही इस मुद्दे पर राजनीतिक घमासान मचा, पेंगुइन इंडिया ने तुरंत एक नया बयान जारी कर अपनी सफाई पेश की। बेचारे प्रकाशक! उन्हें शायद अंदाजा नहीं था कि भारत में किताबों की समीक्षा साहित्यिक आलोचक नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के प्रवक्ता टीवी स्टूडियोज में चिल्ला-चिल्लाकर करते हैं। इस ‘विशेष मुद्दे’ ने पेंगुइन को बर्फीले अंटार्कटिका की ठंडक से निकालकर सीधे भारतीय राजनीति के दहकते तवे पर बैठा दिया है। भाजपा पूछ रही है कि आखिर इस किताब में ऐसा कौन सा परमाणु फॉर्मूला है जिसे छिपाया जा रहा है, वहीं कांग्रेस इस मुद्दे पर वैसी ही गहरी चुप्पी साधे खड़ी है जैसी डॉ. मनमोहन सिंह जी के दस साल के कार्यकाल में अक्सर देखने को मिलती थी।

निष्कर्ष: अनकही किताब का महा-सत्य

अंत में, काक-वाणी का यही मानना है कि जो किताब छपकर बाजार में आ जाती है, वह सिर्फ इतिहास बनती है। लेकिन जो किताब किसी ‘विशेष मुद्दे’ के कारण अलमारी के अंधेरे कोने में बंद रह जाती है, वह किंवदंती बन जाती है। सोनिया जी की यह अधूरी किताब भी भारतीय लोकतंत्र के उस अनसुलझे रहस्य की तरह है, जिसे पढ़ने की नहीं, बल्कि सिर्फ महसूस करने की जरूरत है। धन्य है वह ‘विशेष मुद्दा’ जिसने प्रकाशकों के पसीने छुड़ा दिए, और धन्य है हमारा यह ‘मौन’ लोकतंत्र!


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कागा जी