एक जमाना था जब थिएटर के बाहर लंबी कतारें सिर्फ इसलिए लगती थीं क्योंकि पोस्टर पर किसी खान, कपूर या कुमार का चेहरा चमक रहा होता था। फैंस सिनेमाघरों में केवल अपने चहेते हीरो की एक एंट्री पर सीटियां और तालियां बजाने जाते थे। लेकिन साल 2024 के बदलते समीकरणों को देखकर लगता है कि बॉलीवुड अब एक बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है। क्या हिंदी सिनेमा में अब Bollywood Star Power का सूरज ढल रहा है और ‘फिल्म-फर्स्ट’ यानी कहानी का दौर शुरू हो चुका है?
अब केवल ‘नाम’ से नहीं, काम से चलेगी गाड़ी
हालिया बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट्स और दर्शकों के बदलते मिजाज पर नजर डालें, तो बड़े-बड़े सुपरस्टार्स की भारी-भरकम बजट वाली फिल्में भी पानी मांगती नजर आ रही हैं। दूसरी तरफ, बिना किसी बड़े स्टार के बनी छोटी और मध्यम बजट की फिल्में जैसे ‘लापता लेडीज’, ‘मुंज्या’ और ‘आर्टिकल 370’ दर्शकों का दिल भी जीत रही हैं और पैसा भी वसूल करवा रही हैं। यह इस बात का साफ इशारा है कि दर्शक अब थिएटर में केवल स्टार्स को देखने नहीं, बल्कि एक अच्छी कहानी का अनुभव करने जा रहे हैं।
दर्शक अब समझदार हैं, ‘हवा-हवाई’ ड्रामे से तौबा!
ओटीटी (OTT) के आने के बाद से दर्शकों का नज़रिया पूरी तरह बदल गया है। अब उन्हें घर बैठे ही वर्ल्ड-क्लास सिनेमा देखने को मिल रहा है। ऐसे में अगर कोई फिल्ममेकर सिर्फ किसी बड़े एक्टर के नाम पर घिसी-पिटी कहानी और बेमतलब का एक्शन परोसेगा, तो दर्शक उसे सिरे से नकार देंगे। आज का दर्शक तार्किक और मनोरंजक सिनेमा की मांग कर रहा है। अब सुपरस्टार्स को भी बॉक्स ऑफिस पर टिकने के लिए एक ठोस स्क्रीनप्ले और बेहतरीन अभिनय की जरूरत है, न कि केवल अपने स्टारडम की।
क्या सुपरस्टार युग का अंत हो रहा है?
इसे सुपरस्टार युग का अंत कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन यह निश्चित रूप से उनके एकाधिकार (Monopoly) का अंत है। अब सिनेमा केवल सितारों के कंधों पर नहीं, बल्कि लेखकों और निर्देशकों के विजन पर टिकी है। ‘काक-वाणी’ का मानना है कि यह बदलाव हिंदी सिनेमा के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी और खूबसूरत है। जब तक कहानी दमदार नहीं होगी, तब तक स्टार का चमकना नामुमकिन है। अब देखना यह है कि हमारे चमकते सितारे इस ‘कहानी-प्रधान’ नए युग में खुद को कैसे ढालते हैं!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें