परिचय: रामू काका और उनकी बेटी दृष्टि
एक छोटे से सुंदर गाँव में रामू नाम का एक बूढ़ा कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बहुत ही सुंदर, आकर्षक और मजबूत बर्तन बनाता था। रामू के बनाए बर्तनों की मांग दूर-दूर के शहरों तक थी। लेकिन रामू की जिंदगी में एक गहरा दर्द था। उसकी बारह साल की बेटी, दृष्टि, जन्म से ही देख नहीं सकती थी। रामू को हमेशा यह चिंता सताती थी कि उसके बूढ़े होने और इस दुनिया से चले जाने के बाद उसकी लाडली बेटी का क्या होगा। वह दिन-रात भगवान से यही प्रार्थना करता था कि दृष्टि को कोई ऐसा रास्ता मिल जाए जिससे वह आत्मनिर्भर बन सके।
चुनौती और संघर्ष की शुरुआत
रामू जब भी आंगन में बैठकर चाक पर मिट्टी को सुंदर आकार देता, दृष्टि हमेशा उसके पास आकर बैठ जाती थी। वह चाक की घूमती हुई आवाज को बड़े ध्यान से सुनती और अपनी नन्हीं उंगलियों से गीली मिट्टी को छूकर महसूस करती थी। एक बार दिवाली का त्योहार नजदीक था और रामू को दीयों का एक बहुत बड़ा ऑर्डर पूरा करना था। लेकिन अचानक रामू की तबीयत बहुत खराब हो गई। वह बुखार से तपने लगा और बिस्तर से उठने लायक भी नहीं रहा। रामू की आँखों में आँसू थे, क्योंकि अगर यह ऑर्डर समय पर पूरा नहीं हुआ, तो इस बार उनके घर में दिवाली पर अंधेरा रह जाता और साख भी मिट्टी में मिल जाती।
हौसले और विश्वास की नयी परिभाषा
अपने पिता को रोता देख दृष्टि आगे आई। उसने रामू के कांपते हाथों को अपने नन्हें हाथों में लिया और बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा, “पिताजी, आप चिंता मत कीजिए। आँखें भले ही मेरे पास नहीं हैं, लेकिन मिट्टी की खुशबू और आपका सिखाया हुआ हुनर मेरी रूह में बसा है। मैं इस ऑर्डर को पूरा करूंगी।”
दृष्टि चाक के पास जाकर बैठ गई। उसने अपने नाजुक हाथों में गीली मिट्टी उठाई और चाक को घुमाया। पहली बार में मिट्टी बिखर गई, दूसरी बार भी वह सही आकार नहीं दे पाई। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह लगातार कोशिश करती रही। रामू बिस्तर से लेटे-लेटे अपनी बेटी के इस अद्भुत प्रयास को देख रहा था। कुछ ही देर में, दृष्टि की उंगलियां मिट्टी से बातें करने लगीं। उसने अपनी स्पर्श शक्ति से ऐसे जादुई और कलात्मक दीये तैयार किए, जैसे रामू ने भी अपने पूरे जीवन में नहीं बनाए थे। उसने दीयों के किनारों पर अपनी उंगलियों से ऐसी सुंदर नक्काशी की, जिसे देखकर कोई भी हैरान रह जाता।
हौसले की जीत और अटूट विश्वास
जब दीये भट्टी में पककर तैयार हुए, तो दृष्टि ने उन्हें छूकर महसूस किया। उसके चेहरे पर जो संतोष और मुस्कान थी, वह दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज थी। जब गाँव के लोग और व्यापारी दीये लेने आए, तो वे उन अनोखे दीयों की खूबसूरती देखकर दंग रह गए। सभी दीये हाथों-हाथ बिक गए। रामू की आँखों से खुशी और गर्व के आँसू बह रहे थे। दृष्टि ने साबित कर दिया था कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए शारीरिक आँखों की नहीं, बल्कि मन के अटूट विश्वास और हौसले की जरूरत होती है।
कहानी की सीख
सीख: इस प्रेरणादायक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों और हमारे अंदर कितनी भी कमियां क्यों न हों, यदि हमारा हौसला बुलंद है और हम खुद पर विश्वास रखते हैं, तो हम अपनी कमजोरी को भी अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकते हैं।