काक-वाणी के सभी सुधी पाठकों को कांव-कांव भरा नमस्कार! हाल ही में ‘द हिंदू’ अखबार ने एक बड़ा ही गंभीर लेख छापा है, जिसका लब्बोलुआब यह है कि राजनीति में ‘अपशब्द’ और ‘गाली-गलौज’ अब एक नई राजनीतिक भाषा बन चुके हैं। हम काक-वाणी के मंच से इस पश्चिमी सोच वाले शोध का पुरजोर विरोध करते हैं। भला गाली को ‘अपशब्द’ कहना हमारे नेताओं की अद्वितीय प्रतिभा का अपमान नहीं है? यह अपशब्द नहीं, बल्कि हमारे कर्मठ नेताओं की अंतरात्मा से निकली वह ‘शुद्ध साहित्यिक अभिव्यक्ति’ है, जो सीधे जनता के दिलों पर और कभी-कभी टीवी स्क्रीन पर वार करती है।
द हिंदू वाले इसे ‘प्रोफेनेशन’ यानी भाषा का अपवित्रीकरण कह रहे हैं, मानो पहले राजनीति गंगाजल से धुली हुई थी। अरे साहब, यह अपवित्रीकरण नहीं, बल्कि भाषा का ‘अनलॉकिंग’ है। हमारे दूरदर्शी नेताओं ने भाषा को व्याकरण की बेड़ियों से मुक्त करा दिया है। अब किसी को अपनी बात समझाने के लिए उबाऊ तथ्यों या आंकड़ों की जरूरत नहीं पड़ती; बस एक जोरदार, मसालेदार गाली फेंकिए और विरोधी दल के तर्कों को धराशायी कर दीजिए!
गालीशास्त्र का नया स्वर्ण युग और हमारे ‘संस्कारी’ नेता
वह भी क्या पुराना जमाना था जब नेता संसद में खड़े होकर कबीर के दोहे या गालिब की शायरी सुनाया करते थे। कितने उबाऊ और थकाऊ थे वे दिन! न कोई सनसनी, न टीआरपी का धमाका, और न ही सोशल मीडिया पर मीम्स बनने का कोई स्कोप। भला हो हमारे आधुनिक युग के नेताओं का, जिन्होंने भाषा के इस बंजर मरुस्थल को अपनी रचनात्मक गालियों से हरा-भरा कर दिया है। आज स्थिति यह है कि जब तक कोई नेता मंच से अपने विरोधी को ‘दीमक’, ‘गद्दार’, ‘राक्षस’ या ‘जेबकतरा’ न कह दे, तब तक भोली-भाली जनता को लगता ही नहीं कि चुनावी रैली शुरू भी हुई है।
लोकतंत्र का नया व्याकरण: जहां ‘तू-तड़ाक’ ही सत्य है
आज की प्रगतिशील राजनीति में शिष्टाचार का सीधा मतलब कायरता समझा जाता है। यदि आप अपने विरोधी का सम्मानपूर्वक नाम ले रहे हैं, तो मान कर चलिए कि आपका टिकट अगली बार कटने वाला है। राजनीति के नए शब्दकोश में ‘आप’ शब्द का पूरी तरह विलोपन हो चुका है और ‘तू’ तथा ‘तेरी’ का अखंड साम्राज्य स्थापित है।
चुनाव आयोग भी बेचारा परेशान है, वह कितनी बार नोटिस भेजे? अब तो हमारे साहसी नेता चुनाव आयोग के नोटिस को ‘सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर’ की तरह अपनी छाती पर टांगकर घूमते हैं। जिस नेता को जितना बड़ा नोटिस मिला, वह उतना ही बड़ा ‘जनायक’ बनकर उभरता है। आखिरकार, भाषा का यह ‘लोकतांत्रीकरण’ ही तो असली विकास है। इसलिए, आइए हम सब मिलकर इस नए ‘गालीशास्त्र’ का स्वागत करें, क्योंकि सभ्य भाषा तो बस इतिहास की किताबों में अच्छी लगती है, असली लोकतंत्र तो इसी शोर-शराबे और गाली-गलौज में ही सांस लेता है!
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