Title: अर्जुन की महाबली बन्दूक
एक गांव में एक युवक नाम अर्जुन रहता था। वह बहुत समर्थ था और अपनी समर्थता के कारण उसे गांव का महाबली माना जाता था। अर्जुन का बाप एक षड्यंत्र से मारा गया था और उस समय से अर्जुन उपदेशक के रूप में झंझट करता रहता था।
एक दिन अर्जुन ने गांव के गुरुजन से बात की, जो उसे एक जादुई बंदूक दिखाने ले गए। बंदूक गुरुजी ने उसे सौंदर्य, स्थायित्व, सीमा और नियंत्रण विशेषताओं के साथ परिचय कराई। अर्जुन को इस बंदूक के प्रति मिठास व हृदय से आकर्षित हो गया।
अर्जुन ने बंदूक की खूबियों को समझने के लिए गुरुजी के पास रुक कर सीखा। उसने ज्ञान और समर्थता प्राप्त करके इस बंदूक की शक्ति को समझा और उसे खेलने के बाद बड़ी आसानी से संचालित करना सीख लिया।
दिनों दिन अर्जुन इस बंदूक के साथ प्रैक्टिस करके माहिर होता गया। उसे इसे ठीक ढंग से संचालित करना था और जब तक वह अपने लक्ष्य तक वाकई मार नहीं सकता था, तब तक वह हर चीज पर नियंत्रण रखता था।
एक दिन एक घटना हुई जिसने अर्जुन को उसकी महाबली बन्दूक पर अपनी निश्चितता और नियंत्रण को लगातार समझाया। अर्जुन अपनी माँ के साथ बाजार में रह रहा था जब एक बड़ी आवाज से वहां का चोर कहाँ जाता हुआ सुनाई दिया।
चोर भागता हुआ गाड़ी से निकला और कुछ बंदोकों से उसे पीछे करता हुआ दौड़ने लगा। तभी अर्जुन देखा गया और वहां अपनी माँ से अलग हो गया।
अर्जुन की माँ बहुत डर गयी क्योंकि एक स्थान पर उसे बंदूक से समझौता करने वाला छोटा सा लड़का लड़ रहा था। लोग चिपक कर खड़े थे।
अर्जुन बंदूक के सहारे अच्छी तरह से भागता हुआ आ गया था। वह शानदार ढंग से बंदूक को संचालित करता हुआ कुछ बंदों के पीछे भागने लगा।
अर्जुन को बंदूक में पूरी तरह से विश्वास था और उसने अपने लक्ष्य की ओर निरंतर दौड़ लगाई। अर्जुन दौड़ता रहा जब तक कि वह चोर को खत्म नहीं कर देता।
अर्जुन बहुत सुखी था क्योंकि उसने अपनी माँ को उस स्थिति से निकाला जिसमें वह कुछ डर कर तड़प रही थी। उसने एक बड़ा परिवर्तन किया था, जिसे उसने सोचा भी नहीं था कि वह कर सकता है।
अब उसे महाबली माना नहीं जाता था क्योंकि उसने जो बड़ा कर दिया था, वह बंदूक की शक्ति के साथ उसकी धैर्यवानी, निश्छलता और संयम के एक बलिदान से हुआ था।