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ऋणी पूरे दिन मेरी नजरें ईंटों के मोड़ पर टिकी हुई

ऋणी

पूरे दिन मेरी नजरें ईंटों के मोड़ पर टिकी हुई थीं। मैं वहां बैठा था, सोचता हुआ कि जब मैं कुछ नहीं होता हूँ, तब मेरी ज़िंदगी का मक़सद क्या होता है। मुझे पता था कि मैं यहां परेशान होकर कुछ नहीं कर सकता था। मुझे अपनी परेशानियों से निपटना ही पड़ता था।

फिर एक दिन मेरी सारी समस्याओं का समाधान मेरी दोस्त की एक फोन कॉल से मिल गया। उसने मुझे अपनी मदद के लिए बुलाया था। मैंने उससे पूछा कि क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूं। और उसने मुझे अपनी समस्या बताई।

उसकी समस्या एक आदमी से थी जिसने उसे ऋण दिया था। ऋण सभी समस्याओं की जड़ थी और इसमें से एक भी समस्या हल नहीं होती थी। और अब वह आदमी मुझसे ऑनलाइन पैसे मांग रहा था।

मुझे उस स्थिति से आश्चर्य हुआ कि कैसे कोई व्यक्ति कुछ भी ले रहा होता है, और अतीत राशियों और पूर्व संग्रहों के बढ़ते ऋण के साथ जब पैसा देना होता है।

वह अविश्वसनीय थी। मैं उससे कहता हूँ कि वह बस उस आदमी को अदालत में चला दे जो उसने उसे ऋण दिया था। लेकिन वह नहीं था। मुझे वह था जो धनभंडार से कुछ नहीं निकाल सकता था, और मैं था जो उसकी मदद कर सकता था। मैं उससे आश्वस्त करता हुआ कि मैं उसे मदद करूंगा इसके लिए उसे कुछ नहीं देना होगा।

यह बहुत सभ्य था और मुझे यकीन था कि मैं इस समस्या का समाधान दूंगा। मैं उसे बताना चाहता था कि यह समस्या कैसे आती है लेकिन मुझे लगा कि उसे आज ही इससे छुटकारा मिल जाना चाहिए।

यह समस्या बहुत अनुपातिक थी और मुझे पता था कि मैंने अभी तक उस राशि को वापस नहीं किया। इसलिए मुझे उसके घर जाना था। वह अगले दिन शाम को था।

मैं उसके लिए तैयार था और वह अपने घर पर मुझे इंतज़ार कर रहा था। मैंने उसे पैसे दिए और सोचा कि मैंने उससे अधिक पैसे दे दिए होंगे लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

अगले दिन, जब मुझे उससे मिलने गया था, तब मुझे उसने एक पत्र दिया था, जो उसने मेरे साथ दिया था। उसने मुझे एक बड़ी समस्या के बारे में संदेश भेजा था।

थोड़ी देर बाद, मैंने उसे फोन किया था और उससे कहा कि मैं उसकी मदद करूँगा और कुछ नहीं चाहूंगा। मेरी तुरंत प्रतिक्रिया हमारी दोस्ती को संजोए रखने में सफल हो गई।

वह था जो मुझे पता था और मुझे उसका भरोसा था। मैं अब फिर से उससे मिलकर जीत रहा था।

इस समस्या से मुझे इतना समझ आ गया था कि हम अपने उद्देश्यों के लिए ऐसी जगह पर कभी विचारण करना नहीं चाहिए जहां हमें अपने साथ मदद मिलती है। और यदि हम उससे आशा नहीं रखते हैं तो हम उससे अपनी समस्याओं को संभालने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।

फिर मुझे ये पता चला कि उस ऋणी आदमी के पास केवल धन था, और वह उन संबंधों को नहीं संभाल सकता था जो हमारी ज़िन्दगी को ख़ुशीयों से भर देता है। उस दिन से लेकर मुझे यह सीख मिली कि धन हमें ख़राब समाज बनाता है और हमारी एकता तोड़ता है।

मैंने उससे पूछा कि क्या उसने उस ऋणी आदमी से अपना नज़रिया बदला। उसने कहा कि उसने उससे उसकी समस्या के साथ जुड़ने की कोशिश नहीं की क्योंकि उसे उससे उम्मीद नहीं थी। उसने मुझसे कहा कि उसने उसको पैसे नहीं दिए थे लेकिन उसने उसको अपनी तरह से मदद तो की थी।

आज मुझे अपनी दोस्ती से ख़ुशी होती है, क्योंकि मैं उस समस्या के लिए जिम्मेदार नहीं हूँ, बल्कि मैं उसके लिए एक सहायक हूँ।

कहते हैं कि पूर्णता से पूर्णता तक का सफर होता है, लेकिन पूर्णता संदर्भ में अलग-अलग होती है। मेरा पूर्णतात्मक संदर्भ संबंधों पर निर्भर करता है। मैं हमेशा इसके लिए उपलब्ध रहता हूँ।

कुछ समझने के लिए कुछ होना जरूरी होता है। और इसलिए मुझे उस गुनाहगार आदमी से अमानत और ज़िम्मेदारी मिली। लेकिन मुझे उसके साथ काम करने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि वह एक गलत रास्ते पर था। इसके बजाय, मैं अन्य लोगों से मिलना चाहता था जो अत्यधिक आत्मविश्वास पर ध्यान देते थे।।

कागा जी

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