एक महीने के लिए रसोई की मदद – एक विदेशी स्त्री ने कैसे सीखा भारतीय पकवानों का स्वाद
जहाँ जहाँ सारी दुनिया कोरोना महामारी के फंसे हुए हैं, वहीं मुंबई में एक विदेशी महिला ने रोजगार के अवसर पाए। यह वह विदेशी महिला आयेशा जोर्डन थी। जो पूरी दुनिया को घेर लेने वाली कोरोना महामारी से बचने के लिए भारत आ गई थी। यहां अपने काम के लिए वह सब सहना करती रही और उसने कुछ नये अनुभव भी पाए। उसकी पूर्व जीवन में भारतीय खाने का कोई बहुत खास ज्ञान नहीं था। उसे सब कुछ बहुत ही अजीब सा लगता था।
एक दिन सोमवार का था। ऐशा काम पर पहुंच गई और वहां द्रविड़िय एक घर का भोजन जुड़वा मेस करने के लिए रख दिया गया था। बेसन का हलवा, संभर इडली, उपमा और मैसूर दोसा समेत कई व्यंजनों को एक समय में कैसे बनाया जाता है, उसे हकीकत में पता नही था। संभर इडली तथा मैसूर ने उसे सबसे अजीब लगा। ऐसा लगता था कि उसमें कुछ नहीं होता और उसे अच्छा नहीं लगता था। लेकिन एक हफ्ते बाद की अगली शुरुआत उसे सबसे पसंदीदा ज्ञान बन गया।
वह घर पर थी और उसको यह जानकारी मिली कि कैसे मसाले का इस्तेमाल करते हुए अचारी भिंडी बनाई जाती है। उसे आज तक भिंडी खाने की ज्यादा खुशी महसूस नहीं हुई थी, लेकिन यह रेसिपी महीने के अंत तक एक वर्ष तक उसकी पसंदीदा रेसिपी बन गई।
इसके बाद से, वह यह सब सीखने के लिए तैयार हो गयी। वह हर दिन खा कर अपना मूड संतुष्ट करती थी। उसने सीखा कि समय कम होने पर कैसे कुछ अन्य पकवानों को त्वरित रूप से बनाया जाता है।
एक दिन वह अपने दोस्त की शादी में गई थी। वहाँ उसे भारत के अन्य इलाकों के पकवानों से भीर पड़ रही थी। लेकिन वह इस बात से निराश नहीं हुई। अधिक संख्या में भोजन और विस्तृत मेनू ने उसे समझाया कि कितना अधिक उत्पादन होता है।
उस बार्तनधुली वाले संभावित गंध के दर्द से पीड़ित एक तत्कालीन रसोई खाना बनाने के 20 मिनट के अंदर-अंदर गैर-लीन कमरे में, एक संभावित प्रतियोगी अलग-थलग क्षेत्र में बिना मदद के बनाना चाहती हुई थी। उसने वहाँ जाकर उन्हें देखा और उसे पता था कि वह कैसे महसूस कर रही होगी। इसलिए ऐशा वहाँ रहकर उसकी मदद करने को तैयार थी। वह उस तत्कालीन रसोई खाना बनाने में मदद कर सकती थी।
उसे लगता था कि यह तैयारी आसान होगी, मगर ऐसा नहीं था। उसने ऊपरी अग्नि पर एक बड़े कडाही को खाली किया जिसमें ताड़ का तेल था, फिर उसने कॊंदा कपूर केबल में डाल दिया था जो गंधोद्धूत होता है और फिर जंगली नमक में पहली बार मिला किस्मी स्थानांतरित किया गया था, इसके बाद उसने कुछ सांझी खाने के उपलब्धता मिलने पर ऑटोमेटेड कटिंग-एज मशीन की मदद से टमाटर का कोई आधा किलो चकाया था।
ऐशा ने सभी वस्तुओं की सहायता दिए बिना, रसोई में खाने के आणविक भाग टालते हुए छोटे से डबल ट्रेसर के माध्यम से एक कडाही में उपमा चावल बनाया। फिर वह उसे दिया, जो अधिक से अधिक खुश हो जाता है। वह कुछ नहीं खा पाती थी। इसलिए उसे लगता था कि वहाँ उथल-पुथल थी। लेकिन इसी मौके पर सब कुछ बदलने वाला था।
वह उस भोजन पर भी बौखला गई। उसे वह सब कुछ खाने का मज़ा बहुत आया था। उसे यह पसंद आया कि उसकी रसोई में हमेशा समय के अनुसार समान भागों में विद्यमान होना चाहिए। अर्थात ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के भोजनों के लिए अलग-अलग खाने किए जाने चाहिए।
एक अन्य सभ्यता जो उसे बहुत पसंद आयी, उसके काम में थोड़ा समय में मिथाइयों के लिए भी समान खेलने की आवश्यकता थी। वह रस्सी झुला भी बताती है जिसे कड़वी मीठी आदि के लिए उपयोग किया जाता है।
ऐशा को भी भारतीय पकवानों की प्रेम भावना वास्तव में बिल्कुल अपूर्व थी, वह किसी प्रकार से फेवर में फंस गई लेकिन सफलता की कुछ जल्दबाजी शुरू हुई और वह फिर से आवश्यकता होते ही समान भागों में खेलती थी, नहीं तो कभी भी खाने में मांग आ जाती है। वह स्ट्रीट फ़ूड का भी शौकीन बन गई।
उस बॉम्बे उद्यान की झोपड़ी बाजार पर उसने कुछ चुनिंदा मुम्बई स्टाइल की चाट खाई। मैरी चुटनी को स्वादिष्ट बनाने वाले क्रेमी सफ़ेद पेंस और हल्दी-पुदीना स्वाद वाली ऊबट्टन ठंडी चाट बड़े तिल सोपान और नमक की चटानी के साथ।
उस वक्त से ऐशा को भारत से जुड़ी संस्कृति और खाने की विविधता से प्रेम हो गया। कभी-कभी वह अब भी भारतीय खाने की आस पास सैल करने जाती है और कुछ नये व छोटे शहरों का पता लगाती है। नये विचार, भूलमुफ्त रसोई की कौशल और भारतीय खाने में इसका प्रेम भरा होना आशा है कि उसे हमेशा याद रहेगा।