क्रांति का नया पता: बंदूक की नली से एसी कमरे के कीबोर्ड तक!

वाह! क्या अद्भुत विकास यात्रा है। डार्विन साहब आज जिंदा होते तो इंसानी विकास के सिद्धांत को ठंडे बस्ते में डालकर वामपंथियों के इस ‘महान विकास’ पर एक नया शोध ग्रंथ लिख डालते। कभी जो क्रांति बंदूक की नली से निकलती थी, वह आज ट्विटर (X) के ‘ब्लू टिक’ और जेएनयू के ढाबों पर चाय की चुस्कियों के बीच दम तोड़ रही है। ‘नक्सलबाड़ी से दिमागी नक्सल’ तक का यह सफर केवल एक खबर नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक आलस्य की दास्तान है जिसने हथियार उठाने की मेहनत को कीबोर्ड थपथपाने की विलासिता में बदल दिया है।

क्रांति का नया ‘वर्क फ्रॉम होम’ मॉडल

पुराने जमाने के नक्सली जंगलों में मच्छर कटवाते थे, पुलिस की लाठियां खाते थे और सूखी रोटियां चबाते थे। आज के आधुनिक लाल-सलामियों को देखकर लगता है कि वे बेचारे फालतू में ही इतनी मेहनत कर रहे थे। असली क्रांति तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ मॉडल में थी! आज के ‘दिमागी नक्सल’ ने क्रांति को डिजिटल और बेहद आरामदायक बना दिया है। अब पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए पहाड़ों पर भटकने की जरूरत नहीं है। इसके लिए बस एक हाथ में पांच सौ रुपये वाली मंहगी स्टारबक्स की कॉफी होनी चाहिए और दूसरे हाथ में चमचमाता हुआ आईफोन। आईफोन भी तो पूंजीवाद की ही देन है, लेकिन ‘दुश्मन के हथियार से दुश्मन पर वार करना’ ही तो असली द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है, क्यों?

‘दिमाग’ का इस्तेमाल और सत्ता का खौफ

इधर सरकारें भी हैरान-परेशान हैं। पहले दुश्मन को ढूंढना आसान था—जो जंगल में हरा कुर्ता पहने बंदूक लिए खड़ा है, वही नक्सली है। लेकिन अब? अब तो जेएनयू के प्रोफेसर, एनजीओ के एक्टिविस्ट, अंग्रेजी बोलने वाले बुद्धिजीवी और यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर ‘असहमति’ जताने वाले भी नक्सली घोषित हो रहे हैं। यानी अब खतरा केवल बारूद से नहीं है, बल्कि उस ‘दिमाग’ से है जो बिना किसी सरकारी परमिशन के सोचने की गुस्ताखी कर लेता है। काक-वाणी का मानना है कि यह दुनिया का पहला ऐसा युद्ध है जहाँ बिना किसी सेना के, केवल ‘ट्वीट्स’ और ‘सेमिनार’ से सरकारें थर-थर कांप रही हैं।

सर्वहारा का उद्धार, लक्जरी कारों से

इस विकास यात्रा का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि अब ‘सर्वहारा’ वर्ग को खुद नहीं पता कि उसका प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है। लुटियंस दिल्ली के शानदार बंगलों में बैठकर, पांच सितारा होटलों में सेमिनार आयोजित कर, देश के गरीब आदिवासियों के अधिकारों पर अंग्रेजी में चिंता जताना ही आज का ‘दिमागी नक्सलवाद’ है। क्रांति अब लाल झंडे से ज्यादा, विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ की पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में चमकती है।

अंततः, ‘काक-वाणी’ इस अभूतपूर्व विकास के लिए भारतीय वामपंथ को बधाई देती है। कम से कम आपने जंगलों को खाली कर पर्यावरण संरक्षण में तो योगदान दिया, भले ही संसद की सीटें खाली हो गई हों!</p


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कागा जी