पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने एक बहुत ही गंभीर और क्रांतिकारी सुझाव दिया है। उन्होंने कहा है कि भारत को चीन की घरेलू राजनीति का अधिक बारीकी से अध्ययन करना चाहिए। वाह! गोखले साहब, आपने हमारे देश के कर्मठ और सदैव चुनावी मोड में रहने वाले नेताओं के मन की बात छीन ली। अब तक हमारे नेता केवल पड़ोसी देश की सीमा पर ‘लाल आंखें’ दिखाने में व्यस्त थे, लेकिन अब उन्हें ड्रैगन के घर के अंदर झांकने का आधिकारिक निमंत्रण मिल गया है।
बिना विपक्ष वाली सुखद राजनीति का सपना
कल्पना कीजिए, यदि हमारे भारतीय नेता सचमुच चीन की घरेलू राजनीति का अध्ययन करने बीजिंग पहुंच जाएं, तो वे वहां से क्या सीखकर लौटेंगे? चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का सबसे बड़ा पाठ तो यही है कि ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’। यानी, न रहेगा विपक्ष, न होगी संसद में कोई बहस। हमारे नेता वहां की ‘एकतरफा’ व्यवस्था देखकर लार टपकाने लगेंगे। वे सोचेंगे कि हर पांच साल में जनता के पैर छूने, रैलियों में धूल फांकने और मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के झंझट से कितना बढ़िया छुटकारा है! एक बार कुर्सी पर बैठो और शी जिनपिंग की तरह जीवनभर के लिए अमर हो जाओ।
डिसेंट को ‘डिलिट’ करने की कला
हमारे नेता चीन से आर्थिक सुधारों की नीतियां सीखें या न सीखें, लेकिन वे असहमति को ‘म्यूट’ करने की चीनी तकनीक जरूर सीख लेंगे। वहां कोई सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ लिख दे, तो वह अगले दिन चाय की दुकान पर नहीं, सीधे सरकारी मेहमानखाने में मिलता है। हमारे देश के सत्ताधारी और विपक्षी, दोनों ही इस कला को सीखने के लिए व्याकुल होंगे। भारत में तो अभी सिर्फ इंटरनेट बंद करना या यू-ट्यूब चैनल ब्लॉक करना ही आता है, वहां तो सीधे पूरे सर्च इंजन को ही गायब कर दिया जाता है। हमारे नेताओं के लिए यह किसी दिव्य ज्ञान से कम नहीं होगा।
सामाजिक क्रेडिट और वोट बैंक
चीन की एक और खूबी है—’सोशल क्रेडिट सिस्टम’। हमारे नेता सोचेंगे कि क्यों न भारत में भी ऐसा ही सिस्टम लागू कर दिया जाए? जो नागरिक सरकार की जितनी तारीफ करेगा, उसे उतना ही राशन और मुफ्त बिजली मिलेगी। और जो सवाल पूछेगा, उसका क्रेडिट स्कोर जीरो! गोखले जी, आपकी इस सलाह के बाद डर है कि कहीं हमारे नेता चीन की विकास दर का अध्ययन करने के बजाय, वहां के नियंत्रण तंत्र का पीएचडी कोर्स न कर लें। भारत के लोकतंत्र को चीन की तानाशाही से बचाने के लिए बेहतर होगा कि हम उन्हें अपनी ही ‘घरेलू राजनीति’ की कीचड़ में खेलने दें, कम से कम यहां जनता को पांच साल में एक बार हिसाब बराबर करने का मौका तो मिलता है!
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