अरे ओ ढोल-नगाड़े बजाने वालों! जरा थमो और न्यू यॉर्क के उस आलीशान दफ्तर की तरफ शीश नवाओ, जहाँ से आखिरकार भारत को ‘विश्वगुरु’ मानने का सबसे बड़ा गोरिया प्रमाण-पत्र जारी हो गया है। जी हाँ, ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ के एक ज्ञानी पत्रकार महोदय भारत पधारे थे। वे आए, उन्होंने भारत को देखा, शायद किसी ऑटो वाले से बातचीत की, और फिर अपनी ज्ञान-इंद्रियाँ खोलकर लिख मारा— “I Went to India and Found It Has Lessons for Us All”। यानी भारत के पास अब अमेरिका और यूरोप को सिखाने के लिए ‘महान सबक’ हैं।
गोरा सर्टिफिकेट और हमारी राष्ट्रीय आत्म-मुग्धता
दशकों से जो पश्चिमी मीडिया भारत में सिर्फ गरीबी, कचरा, ट्रैफिक और लोकतंत्र के कथित खतरों की दूरबीन लेकर घूमता था, उसे अचानक यहाँ ‘सबक’ दिखाई देने लगे हैं। अब हमारे देशी राजनेताओं, टीवी एंकरों और वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के कुलपतियों के लिए इससे बड़ा त्यौहार और क्या हो सकता है? आखिर जब तक कोई विदेशी पत्रकार अपनी भाषा में हमारी पीठ न थपथपाए, तब तक हमारी किसी भी उपलब्धि को मोक्ष कहाँ मिलता है?
आखिर गोरे साहब ने क्या ‘दिव्य सबक’ सीखे?
काक-वाणी की खोजी बुद्धि यह सोचकर परेशान है कि आखिर न्यू यॉर्क टाइम्स वाले साहब ने यहाँ से कौन से अलौकिक सबक सीखे होंगे? क्या उन्होंने यह सीखा कि सड़क के घुटने भर गड्ढे में खड़े होकर, हाथ में 10 रुपये की टपरी वाली चाय लेकर UPI Scan से डिजिटल पेमेंट कैसे किया जाता है? या फिर उन्होंने यह परम ज्ञान प्राप्त किया कि हर दो महीने में किसी न किसी राज्य के चुनाव को ‘बॉलीवुडी ब्लॉकबस्टर थ्रिलर’ में कैसे बदला जाता है?
हो सकता है उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा हो—कि कैसे एक तरफ से सस्ता रूसी तेल खरीदा जाए, दूसरी तरफ अमेरिका से रक्षा सौदे किए जाएँ और तीसरी तरफ पूरी दुनिया को शांति और विश्व-शांति का पाठ पढ़ाया जाए। इसे ही तो असली ‘भारतीय जुगाड़’ कहते हैं!
तीन दिन का दौरा और महा-ज्ञान की प्राप्ति
इन पश्चिमी विचारकों की भी दाद देनी पड़ेगी। ये लुटियंस दिल्ली के किसी पाँच सितारा होटल में रुकते हैं, दो कैब ड्राइवरों से देश का मिजाज पूछते हैं, एक-दो अंग्रेजी बोलने वाले विश्लेषकों के साथ वाइन पीते हैं और पूरे 140 करोड़ भारतीयों की जिन्दगी पर एक ऐतिहासिक निबंध ठोक देते हैं।
खैर, वजह जो भी हो, न्यू यॉर्क टाइम्स के इस एक लेख ने हमारी राजनीति की अतृप्त आत्मा को कुछ पलों की शांति दे दी है। जब तक यही अखबार कल सुबह भारत के लोकतंत्र पर कोई नया कड़वा लेख न छाप दे, तब तक के लिए देशवासियों, इस ‘गोरे प्रमाण-पत्र’ का जश्न मनाइए और गर्व से कहिए—हम सीख दे रहे हैं!
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