‘गो टू पाकिस्तान’ का नया जीपीएस: जब नफरत के सौदागरों को मिलेगा असली वन-वे टिकट!

भारतीय राजनीति का सबसे प्रिय, सदाबहार और मुफ्त का पर्यटन स्थल कौन सा है? जी हां, सही पहचाना—पाकिस्तान! अब तक यह नियम था कि अगर आपने सरकार से सवाल पूछा, महंगाई पर रोए या बेरोजगारी का मुद्दा उठाया, तो आपको तुरंत ‘गो टू पाकिस्तान’ का मुफ्त टिकट थमा दिया जाता था। लेकिन सीजेपी (CJP) के अभिजीत दिपके ने इस पूरे पर्यटन उद्योग का नक्शा ही बदल दिया है। उन्होंने सुझाव दिया है कि ‘गो टू पाकिस्तान’ का नारा उन लोगों के लिए इस्तेमाल होना चाहिए जो देश में हिंदू-मुस्लिम विभाजन की राजनीति करते हैं।

नफरत के सौदागरों का बोरिया-बिस्तर

जरा सोचिए, अगर इस नियम को कड़ाई से लागू कर दिया गया, तो वाघा बॉर्डर पर कितनी लंबी कतार लगेगी! सुबह से शाम तक टीवी चैनलों पर जहर उगलने वाले एंकर, चुनावी रैलियों में ‘शमशान-कब्रिस्तान’ करने वाले माननीय नेतागण, सब अपने सूटकेस में ‘नफरत का एजेंडा’ पैक करके वीजा की लाइन में खड़े होंगे। हमारे देश के कई परम पूजनीय राष्ट्रवादी नेताओं को तो वहां की नागरिकता भी तुरंत मिल जाएगी, क्योंकि नफरत फैलाने की उनकी अद्भुत योग्यता का कोई सानी नहीं है।

सूने हो जाएंगे टीवी स्टूडियो और चुनावी मंच

लेकिन इस क्रांतिकारी विचार का एक दुखद पहलू भी है। अगर देश के सारे नफरती तत्व सीमा पार चले गए, तो हमारे मुख्यधारा के मीडिया का क्या होगा? शाम पांच बजे से शुरू होने वाले वह चीखते-चिल्लाते डिबेट शो, जिनमें बिना किसी तथ्य के सिर्फ हिंदू-मुस्लिम किया जाता है, वहां सिर्फ सन्नाटा पसरा रहेगा। बेचारे प्राइम-टाइम एंकर्स को मजबूरी में शिक्षा, स्वास्थ्य, और गरीबी जैसे उबाऊ मुद्दों पर बात करनी पड़ेगी। क्या देश का दर्शक इस महा-बोरियत को बर्दाश्त कर पाएगा?

पाकिस्तान की भी अपनी सीमाएं हैं!

दूसरी तरफ, हमें पड़ोसी देश के बारे में भी सोचना चाहिए। बेचारा पाकिस्तान पहले से ही कंगाली और आटे की किल्लत से जूझ रहा है। ऊपर से अगर भारत के ये ‘अति-उत्साही’ ध्रुवीकरण के ठेकेदार वहां पहुंच गए, तो वहां की सरकार तो वैसे ही घुटने टेक देगी। हमारे ये नेता वहां जाकर भी विभाजन की राजनीति शुरू कर देंगे और कहेंगे, “देखिए, इस आटे की बोरी का रंग हरा क्यों है, भगवा क्यों नहीं?”

काक-वाणी का साफ मानना है कि नफरत की दुकान चलाने वालों को कहीं भेजने की जरूरत नहीं है। इन्हें यहीं रखकर जनता के असली मुद्दों—रोजगार, शिक्षा और विकास का आईना दिखाना ही इनकी सबसे बड़ी सजा है। वैसे भी, बिना इन नफरती किरदारों के हमारे लोकतंत्र का रंगारंग सर्कस बेहद फीका लगेगा!


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कागा जी