चीनी ‘चाणक्य नीति’ की ट्यूशन: जब अपनी ही राजनीति ‘कॉमेडी शो’ हो, तो ड्रैगन से क्या सीखना?

शुरुआत करते हैं पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले साहब के उस ताज़ा ज्ञान से, जिसमें उन्होंने बड़े ही संजीदा लहजे में कहा है कि भारत को चीन की घरेलू राजनीति का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए। वाह! क्या अद्भुत विचार है। हमारे नीति-निर्माताओं के पास वैसे तो देश की बेरोज़गारी, महंगाई और सड़कों के गड्ढों को समझने से फुर्सत नहीं है, और अब उन्हें बीजिंग के कम्युनिस्टों के आपसी ‘लव-हेट रिलेशनशिप’ पर थीसिस लिखने की सलाह दी जा रही है।

चीन से क्या सीखेंगे हमारे ‘चाणक्य’?

सोचिए, हमारे माननीय नेता जब चीन की राजनीति का अध्ययन करने जाएंगे तो वहां से क्या सीखकर आएंगे? वहां तो चुनाव नाम का कोई ‘त्योहार’ ही नहीं होता। न कोई चुनावी रैलियां, न मुफ्त की रेवड़ियों का शोर, न ‘आया राम, गया राम’ वाले दलबदलू नेता और न ही शाम को टीवी चैनलों पर होने वाली मुर्गों की लड़ाई जैसी डिबेट्स। हमारे नेताओं के लिए तो ऐसा जीवन बेहद उबाऊ और डिप्रेशन देने वाला साबित होगा। अगर चीन जैसी ‘शांत’ और ‘एकतरफा’ तानाशाही हमारे नेताओं ने सीख ली, तो भारत के लोकतंत्र का जो असली मज़ा है—यानी ‘दलबदल और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’—उसका तो जनाजा ही निकल जाएगा!

शी जिनपिंग को हमारे यहां इंटर्नशिप करनी चाहिए

देखा जाए तो सलाह उलटी होनी चाहिए थी। चीन को हमारी घरेलू राजनीति का अध्ययन करना चाहिए। उन्हें शी जिनपिंग को दिल्ली भेजना चाहिए ताकि वे सीख सकें कि बिना किसी कम्युनिस्ट घोषणापत्र के भी कैसे जनता को ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मुफ्त बिजली’ के कॉम्बो पैक पर जिंदा रखा जाता है। उन्हें हमारे यहां से सीखना चाहिए कि कैसे जांच एजेंसियों का ‘सद्उपयोग’ करके विरोधियों का हृदय परिवर्तन कराया जाता है। शी जिनपिंग सालों-साल एक ही कुर्सी पर बैठे-बैठे बोर हो रहे होंगे, उन्हें हमारे नेताओं से सीखना चाहिए जो हर छह महीने में पाला बदलकर नई शपथ ले लेते हैं।

काक-वाणी की मुफ्त सलाह

इसलिए, गोखले साहब की इस सलाह पर समय और सरकारी पैसा ज़ाया करने की बजाय, सरकार को एक ‘राजनीतिक निर्यात विंग’ खोलना चाहिए। हमें चीन को अपनी ‘गठबंधन सरकार’ बनाने और गिराने का हुनर बेचना चाहिए। जब तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी हमारे नेताओं की तरह चुनावी वादे करना और फिर उन्हें ‘चुनावी जुमला’ घोषित करना नहीं सीखती, तब तक उनका राजनीतिक विकास अधूरा ही रहेगा। ड्रैगन की कुंडली बांचने की कोशिश मत कीजिए साहब, हमारे यहां की घरेलू राजनीति समझने में तो खुद विधाता का भी सिर चकरा जाता है!


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कागा जी