डेटा की ‘जादुई कढ़ाई’ और बीबीसी का रोना: तेल बहे पर हमारा विकास न रुके!

वाह! बीबीसी वालों को फिर से पेट दर्द शुरू हो गया है। वजह? भारत की अर्थव्यवस्था। जब पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी हुई है, तब हमारे प्यारे भारत की जीडीपी विकास दर ऐसे उछल रही है जैसे बिना पेट्रोल की बुलेट ट्रेन। अब इस ‘चमत्कार’ को देखकर ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) के गोरे साहबों के पेट में मरोड़ उठना तो लाजिमी था। उन्होंने तुरंत अपनी खोजी दूरबीन निकाली और चिल्लाए—”रुको भाई! इस डेटा की विश्वसनीयता पर हमें शक है!”

आंकड़ों की जादुई कढ़ाई: जो चाहो, वो पका लो

अब इन फिरंगियों को कौन समझाए कि हमारे देश में गणित केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक दिव्य कला है। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में हमने सांख्यिकी (स्टैटिस्टिक्स) को उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जहां खुद न्यूटन और आइंस्टीन भी होते तो अपना सिर खुजलाने लगते। यदि वैश्विक बाजार में तेल महंगा हो गया है, तो क्या हुआ? हमारे पास ‘आधार वर्ष’ (बेस ईयर) बदलने का अचूक ब्रह्मास्त्र जो है! जब भी विकास दर थोड़ी थकी हुई लगती है, हमारे विशेषज्ञ थोड़ा सा फॉर्मूला बदल देते हैं और अर्थव्यवस्था अचानक जिम से निकले पहलवान की तरह डोले दिखाने लगती है। बीबीसी वाले इसे ‘डेटा क्रेडिबिलिटी’ का संकट कहते हैं, और हम इसे ‘आत्मनिर्भर गणित’ कहते हैं!

बीबीसी की जलती हुई आंखें और हमारी जमीनी हकीकत

बीबीसी रो रहा है कि भारत के आंकड़े वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते। अरे साहिब, वास्तविकता से मेल खाकर आंकड़े करेंगे भी क्या? क्या आंकड़े खाने की चीज हैं? जब देश का गरीब से गरीब आदमी भी अखबार के पहले पन्ने पर छपी ‘8 प्रतिशत की ग्रोथ’ देखकर ही अपनी भूख मिटा लेता है, तो आपको क्या तकलीफ है? यह सच है कि जमीन पर घूम रहा बेरोजगार युवा और महंगाई से त्रस्त गृहणी इस ‘ग्रोथ’ को अपनी जेब में नहीं ढूंढ पा रहे हैं, लेकिन डिजिटल इंडिया के इस दौर में सब कुछ कागजों और स्क्रीन्स पर ही तो होना है। जेब खाली रहे तो क्या, देश का ग्राफ तो ऊंचा जा रहा है!

काक-वाणी का सीधा संदेश है: बीबीसी वालों, अपनी इस जलने की बीमारी का इलाज कराओ। हमारे देश में डेटा वैसे ही तैयार होता है जैसे शादियों में बूंदी का रायता—जैसी जरूरत हो, उतना पानी मिला लो। इसलिए, तेल का झटका लगे या बिजली का, हमारा सांख्यिकी विभाग हमेशा देश को नंबर वन बनाकर ही दम लेगा। भारत माता की जय, और हमारे जादुई आंकड़ों की जय-जयकार!


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कागा जी