तिग्मांशु धूलिया की ‘चिंता’ पर काक-वाणी का करारा वार: क्या सच में बदल रहा है बॉलीवुड का ‘नरेटिव’?

बॉलीवुड के बेबाक और शानदार फिल्ममेकर तिग्मांशु धूलिया अपने संजीदा सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने एक ऐसा बयान दे डाला, जिसने सिनेमा गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। तिग्मांशु का मानना है कि आज के बॉलीवुड में एक खास ‘एंटी-मुस्लिम नरेटिव’ को हवा दी जा रही है। उनके अनुसार, पहले फिल्मों में विलेन जागीरदार या डाकू हुआ करते थे, लेकिन अब खलनायकों को एक खास धार्मिक पहचान दी जा रही है। लेकिन क्या सचमुच सिक्का केवल एकतरफा है? चलिए, ‘काक-वाणी’ के मंच पर इस पूरे मामले का एक कड़क और निष्पक्ष काउंटरव्यू करते हैं।

इतिहास का सच या केवल नया एजेंडा?

तिग्मांशु धूलिया जी की चिंता अपनी जगह जायज हो सकती है, लेकिन हमें सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना होगा। आज का सिनेमा इतिहास के उन पन्नों को टटोल रहा है, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। जब ‘तान्हाजी’, ‘पद्मावत’ या फिर ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्में बनती हैं, तो वे इतिहास की कड़वी सच्चाइयों और वास्तविक घटनाओं पर आधारित होती हैं। इसे केवल एक ‘नरेटिव’ का नाम देकर खारिज करना उन अनकही कहानियों के साथ नाइंसाफी होगी, जिन्हें दर्शक हमेशा से देखना चाहते थे। इतिहास को पर्दे पर उतारना प्रोपेगैंडा नहीं, बल्कि कलात्मक स्वतंत्रता है।

क्या सकारात्मक किरदारों पर लग गया है ताला?

अगर हम ध्यान से देखें, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है कि बॉलीवुड ने सकारात्मक मुस्लिम किरदारों को दिखाना बंद कर दिया है। हाल के वर्षों में आई ‘मुल्क’, ‘गली बॉय’, ‘शेरशाह’, ‘राजी’ और ‘मैदान’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों के दिलों को छुआ है। इन फिल्मों में किरदारों को बेहद संवेदनशीलता और देशभक्ति के रंग में रंगा गया है। इसलिए, सिनेमा को केवल एक चश्मे से देखना और यह कहना कि पूरा बॉलीवुड एक ही एजेंडे पर चल रहा है, थोड़ा ज्यादती होगी।

दर्शक हैं असली सिकंदर!

आखिरकार, काक-वाणी की दो टूक बात यही है कि भारतीय दर्शक अब बेहद समझदार हो चुका है। वह केवल किसी एजेंडे या नफरत के बहकावे में आकर अपनी जेब से टिकट के पैसे खर्च नहीं करता। अगर किसी फिल्म की कहानी और अभिनय में दम नहीं है, तो वह बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरती है, चाहे उसका नरेटिव कुछ भी हो। तिग्मांशु जी, सिनेमा का कैनवास बहुत बड़ा है, और इसमें हर रंग के लिए जगह हमेशा रहेगी। जनता सब जानती है!


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कागा जी