घने जंगल में तूफानी रात
बहुत समय पहले की बात है, एक विशाल वृक्ष पर कपोत (नर कबूतर) और कपोती (मादा कबूतर) का एक सुंदर जोड़ा प्रेमपूर्वक रहता था। उनका जीवन सादगी, आत्मीयता और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम से भरा हुआ था। एक शाम अचानक मौसम ने भयानक रूप ले लिया। काले बादलों ने आसमान को घेर लिया और मूसलाधार बारिश होने लगी। रात का अंधकार गहराने लगा और बर्फीली हवाएं चलने लगीं।
उसी जंगल में एक निर्दयी शिकारी फंसा हुआ था। वह ठंड से थर-थर कांप रहा था, उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और भूख से उसकी सांसें उखड़ रही थीं। कोई सहारा न पाकर वह उसी वृक्ष के नीचे आ बैठा, जहां वह पक्षी जोड़ा रहता था। शिकारी ने कांपते हुए स्वर में प्रार्थना की, “हे इस वृक्ष के देवता! मैं भूख और ठंड से मर रहा हूँ, आज रात मुझे अपनी शरण में ले लो।”
अतिथि देवो भवः का पावन धर्म
पेड़ की डाल पर बैठी कपोती ने शिकारी की करुण पुकार सुनी। उसने अपने पति से कहा, “स्वामी! हमारे द्वार पर एक संकटग्रस्त अतिथि आया है। शास्त्रों के अनुसार अतिथि की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है, चाहे वह हमारा शत्रु ही क्यों न हो।”
नर कबूतर ने बिना किसी संकोच के अपनी पत्नी की बात का समर्थन किया। वह तुरंत उड़कर आसपास से सूखी लकड़ियां और सूखे पत्ते चुन लाया। फिर उसने किसी तरह आग सुलगाई ताकि शिकारी ठंड से बच सके। आग की लपटें देखकर शिकारी को ठंड से थोड़ी राहत मिली, लेकिन उसकी भूख अभी भी शांत नहीं हुई थी।
महान आत्मत्याग की करुण पराकाष्ठा
कबूतर ने देखा कि उसके पास अतिथि को खिलाने के लिए कोई अन्न का दाना नहीं है। उसने मन ही मन सोचा कि एक गृहस्थ के रूप में यदि मैं अपने शरण में आए अतिथि की भूख न मिटा सकूं, तो मेरा जीवन व्यर्थ है। अपनी करुणा और धर्म का पालन करने के लिए, नर कबूतर ने ईश्वर का ध्यान किया और हंसते-हंसते जलती हुई आग में छलांग लगा दी, ताकि शिकारी उसका मांस पकाकर अपनी भूख बुझा सके।
यह दृश्य देखकर शिकारी स्तब्ध रह गया। तभी, अपने पति के इस असीम त्याग को देखकर कपोती का हृदय वेदना से भर गया। वह पति के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। उसने रोते हुए कहा, “स्वामी, आपके बिना मेरा जीवन निरर्थक है।” और उसने भी अपने पति का अनुसरण करते हुए उसी अग्नि कुंड में अपने प्राण त्याग दिए।
शिकारी का हृदय परिवर्तन
नन्हे पक्षियों के इस अभूतपूर्व प्रेम, त्याग और आतिथ्य धर्म को देखकर शिकारी का पाषाण जैसा कठोर हृदय पूरी तरह पिघल गया। उसकी आंखों से अश्रूधारा बहने लगी। पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए उसने अपने धनुष-बाण तोड़ दिए और कसम खाई कि वह आज के बाद कभी किसी जीव की हत्या नहीं करेगा। पक्षी जोड़े के बलिदान ने एक पापी को महात्मा बना दिया था।
कहानी की नैतिक सीख
नैतिक सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा त्याग, प्रेम और करुणा दुनिया के सबसे कठोर दिल इंसान को भी बदल सकती है। इसके साथ ही, अपने द्वार पर आए संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता करना ही मानवता का सबसे बड़ा धर्म है।