एक अनोखा परिवार और अटूट विश्वास
सुंदरवन के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में देवदत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी रमा और नवजात बेटे के साथ रहता था। उनके घर में एक और सदस्य था – ‘चीकू’, एक नन्हा नेवला। देवदत्त को यह नेवला जंगल में घायल अवस्था में मिला था। रमा ने उसे ममता की छांव दी और अपने बच्चे की तरह पाला। चीकू और उनका बच्चा एक साथ खेलते, खाते और बड़े हो रहे थे। दोनों के बीच एक अनूठा रिश्ता बन गया था।
गाँव के लोग अक्सर देवदत्त को टोकते थे, “जानवर आखिरकार जंगली ही होता है, उस पर इतना भरोसा मत करो।” लेकिन रमा हमेशा मुस्कुराकर कहती, “प्यार की भाषा इंसान से ज़्यादा जानवर समझते हैं।” चीकू ने भी कभी उनका भरोसा नहीं तोड़ा था।
वह काली दोपहर और काल का साया
एक दिन, देवदत्त भिक्षा मांगने बाहर गया था और रमा को नदी से पानी लाने दूर जाना था। बच्चा घर के आंगन में पालने में शांति से सो रहा था। रमा ने चीकू के सिर पर हाथ फेरा और प्यार से कहा, “चीकू, मैं थोड़ी देर में आती हूँ, मेरे लाल का ख्याल रखना।” चीकू ने अपनी छोटी-छोटी चमकदार आँखों से हामी भरी और पालने के पास मुस्तैद होकर बैठ गया।
रमा के जाने के कुछ ही समय बाद, घर की दीवार के पीछे से एक विशाल और ज़हरीला काला नाग सरकता हुआ पालने की तरफ बढ़ने लगा। सांप को देखकर चीकू का शरीर तन गया। अपने छोटे भाई की जान खतरे में देखकर चीकू ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी। वह सांप पर टूट पड़ा। दोनों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। चीकू छोटा था, लेकिन उसका साहस विशाल था। अंततः, उसने सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस लड़ाई में चीकू का पूरा मुंह और पैर खून से लथपथ हो गए थे। वह हांफता हुआ दरवाजे पर आकर बैठ गया, ताकि अपनी माँ (रमा) के आते ही अपनी बहादुरी की शाबाशी पा सके।
एक भयानक भूल और अंतहीन पश्चाताप
जब रमा पानी का घड़ा लेकर घर लौटी, तो उसने दरवाजे पर खून से सने चीकू को देखा। भय और आशंका से उसका दिल कांप उठा। उसने बिना सोचे-समझे मान लिया, “इस जंगली जानवर ने मेरे मासूम बच्चे को मार डाला!”
क्रोध, दुःख और पागलपन में आकर रमा ने पानी से भरा भारी मिट्टी का घड़ा पूरी ताकत से चीकू के ऊपर पटक दिया। एक भारी आवाज हुई, और चीकू का नाजुक शरीर कुचल गया। चीकू की आँखों में आखिरी पल में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरा दर्द और शिकायत थी, मानो वह पूछ रहा हो – “माँ, क्या यही मेरी वफ़ादारी का इनाम था?” और उसने वहीं दम तोड़ दिया।
रमा रोती-चिल्लाती हुई अंदर भागी। लेकिन कमरे का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका बच्चा पालने में खिलखिलाकर हंस रहा था और ज़मीन पर एक विशाल काले सांप के कटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे। रमा को अपनी भयानक भूल का अहसास हो चुका था। वह दौड़कर बाहर आई और चीकू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर दहाड़ें मारकर रोने लगी। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका सबसे वफ़ादार रक्षक हमेशा के लिए सो चुका था।
कहानी से सीख (Moral)
इस प्रसिद्ध पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह अमूल्य सीख मिलती है कि अत्यधिक क्रोध और जल्दबाज़ी में किया गया कार्य हमेशा विनाशकारी होता है। परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न दिखे, बिना सोचे-समझे और बिना पूरी सच्चाई जाने लिया गया निर्णय जीवनभर का ऐसा पश्चाताप बन जाता है जिसका कोई अंत नहीं होता।