बादशाह अकबर का अनोखा प्रश्न
एक दिन मुगल सम्राट अकबर का दरबार सजा हुआ था। सभी सभासद अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे। अचानक बादशाह अकबर के मन में एक गहरा और भावुक विचार आया। उन्होंने पूरे दरबार की ओर देखते हुए प्रश्न किया, “संसार में सबसे अनमोल और पवित्र वस्तु क्या है? जो इसका सही उत्तर देगा, उसे भारी इनाम दिया जाएगा।”
दरबारियों ने तुरंत अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। किसी ने कहा कि हीरे-जवाहरात सबसे अनमोल हैं, तो किसी ने सोने-चांदी और राजसिंहासन को सर्वोच्च बताया। कुछ दरबारियों ने प्रकृति की सुंदरता को सबसे पवित्र कहा। लेकिन बादशाह अकबर किसी भी उत्तर से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। अंत में उनकी दृष्टि अपने सबसे प्रिय और बुद्धिमान मंत्री बीरबल पर पड़ी।
बीरबल का भावुक और अनोखा उत्तर
अकबर ने पूछा, “बीरबल! तुम शांत क्यों हो? तुम्हारा क्या विचार है?”
बीरबल ने अपनी जगह से उठकर बहुत नम्रता से कहा, “जहाँपनाह! इस दुनिया में सबसे अनमोल वस्तु किसी निष्पाप और दुखी मनुष्य की आँख का वह आँसू है, जो न्याय और सत्य की आस में बहता है।”
अकबर को यह उत्तर अटपटा लगा। उन्होंने कहा, “बीरबल, केवल बातों से काम नहीं चलेगा। तुम्हें अपनी यह बात साबित करनी होगी।” बीरबल ने इसके लिए तीन दिनों की मोहलत माँगी।
एक वृद्ध चित्रकार की व्यथा
तीसरे दिन बीरबल दरबार में एक अत्यंत वृद्ध और फटेहाल चित्रकार को लेकर आए। चित्रकार के हाथों में एक पुराना चित्र था और उसकी आँखें भय तथा निराशा से भरी थीं। बीरबल ने वह चित्र बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया।
उस चित्र में एक छोटी सी टूटी-फूटी झोपड़ी बनी थी। झोपड़ी के बाहर एक राजा का मुकुट मिट्टी में पड़ा था और अंदर एक गरीब माँ अपने भूखे बच्चे को चुप कराने का प्रयास कर रही थी। अकबर यह चित्र देखकर क्रोधित हो गए और बोले, “इस चित्रकार ने मुकुट का अपमान किया है! इसे तुरंत कारागार में डाल दिया जाए।”
तब बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह! दंड देने से पहले इस वृद्ध की व्यथा सुन लीजिए। यह चित्रकार अपने समय का महान कलाकार था। जब इसका इकलौता बेटा बीमार पड़ा, तो इसके पास इलाज के पैसे नहीं थे। इसने अपनी बची हुई जमापूंजी से पड़ोसी के अनाथ बच्चे का जीवन बचाया, लेकिन इसका अपना बेटा पैसों के अभाव में दम तोड़ गया। यह चित्र किसी का अपमान नहीं, बल्कि एक गरीब के उस दर्द का प्रतीक है जब राजा का न्याय उस तक समय पर नहीं पहुँच पाता।”
न्याय और सत्य की जीत
बीरबल की बात सुनकर वृद्ध चित्रकार की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। बादशाह अकबर का हृदय यह सुनकर पिघल गया। उनकी स्वयं की आँखें नम हो गईं। उन्हें अहसास हुआ कि बीरबल की बात कितनी सच्ची थी। जनता के दुखों को समझना ही एक राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
अकबर ने सम्मानपूर्वक चित्रकार को गले लगाया, उसे शाही चित्रकार नियुक्त किया और ढेर सारी मोहरें भेंट कीं। अकबर ने बीरबल की चतुराई और संवेदनशीलता की दिल से प्रशंसा की।
कहानी से सीख
सीख: सच्चा ज्ञान और चतुराई केवल तर्क-वितर्क में नहीं, बल्कि दूसरों के दुख-दर्द को समझने और सत्य का साथ देने में निहित है। दया, न्याय और इंसानियत ही दुनिया के सबसे अनमोल रत्न हैं।