दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक बार फिर लोकतंत्र ने हाथ जोड़कर क्षमा याचना की है। कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक और दृढ़ दावा है कि मैदान में ऐसा ‘अथाह जनसैलाब’ उमड़ा था कि बेचारी खाली कुर्सियों को भी सांस लेने की जगह नहीं मिल रही थी। यदि आप जूम लेंस वाला चश्मा लगाकर देखते, तो आपको कार्यकर्ताओं के रूप में बहती हवा, उड़ते कबूतर और मंच पर गर्जते नेता स्पष्ट दिखाई देते। गोदी मीडिया भले ही इसे ‘खाली मैदान’ कहे, लेकिन कांग्रेस के चश्मे से यह देश की अब तक की सबसे बड़ी क्रांति थी!
राहुल बाबा का सर्वोपरि न्याय और जेल का वारंट
इस विशाल ‘जनसैलाब’ (जो केवल कांग्रेस के ट्वीट्स में दिख रहा था) को संबोधित करते हुए हमारे परम श्रद्धेय जननायक राहुल गांधी जी ने अपने ट्रेडमार्क आत्मविश्वास के साथ हुंकार भरी—“ज्ञानेश जेल जाएंगे!” अब यह ज्ञानेश महोदय कौन हैं, उनका अपराध क्या है, और भारतीय न्यायपालिका ने अपनी कलम राहुल जी को कब सौंपी, यह रहस्य देश के संविधान से भी गहरा है। लेकिन राहुल जी की यही तो सबसे बड़ी महानता है; वे देश की अदालतों का कीमती समय बचाते हैं। सजा का ऐलान वे मंच से ही कर देते हैं, तिहाड़ जेल प्रशासन को बस कमरा साफ रखने की देर होती है।
कांग्रेसियों का मानना है कि जब-जब राहुल जी माइक संभालते हैं, विरोधियों के पसीने छूट जाते हैं। हालांकि, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि पसीने विरोधियों के नहीं, बल्कि भीड़ बटोरने वाले स्थानीय नेताओं के छूट रहे होते हैं, जो यह हिसाब लगा रहे होते हैं कि समोसे कितने बंटे और बंदे कितने आए।
रामलीला मैदान की कुर्सियां और राजनीति की पटकथा
रामलीला मैदान का अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। यहां से बड़े-बड़े आंदोलन जन्मे और सरकारें बदल गईं। मगर आज के दौर में यह मैदान कांग्रेस के रिहर्सल मैच का स्थायी स्टेडियम बन चुका है। राहुल जी आते हैं, देश के हर उद्योगपति और अधिकारी को जेल भेजने की समय-सीमा तय करते हैं, और फिर अपनी कर्तव्यनिष्ठा पूरी करके शांत हो जाते हैं।
ज्ञानेश जी को जेल का डर सता रहा है या नहीं, यह तो ईश्वर जाने, लेकिन ‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि यदि राहुल जी का यह ‘जेल प्रेडिक्शन’ मॉडल ऐसे ही चलता रहा, तो बहुत जल्द देश की सभी जेलों का नाम बदलकर ‘राहुल गांधी न्याय परिसर’ रखना पड़ेगा। तब तक के लिए, आप सभी रामलीला मैदान की खाली कुर्सियों की गिनती जारी रखिए!
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