माटी की महक और सोने का भ्रम: जीवन का सच

बहुत समय पहले की बात है, सोनपुर नाम के एक समृद्ध गाँव में देवदत्त नाम का एक मूर्तिकार रहता था। देवदत्त मिट्टी और पत्थरों से जीवंत मूर्तियां बनाने में माहिर था। उसकी कला की धूम दूर-दूर तक थी। लेकिन जैसे-जैसे उसका नाम और पैसा बढ़ा, उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और भय समा गया। वह हर समय अपनी धन-दौलत को सहेजने और खुद को दूसरों से श्रेष्ठ दिखाने के तरीकों के बारे में सोचने लगा।

माया का जाल और देवदत्त की लालसा

देवदत्त का एक ही बेटा था, माधव। माधव बहुत ही सरल और दयालु हृदय का बालक था। वह अक्सर गरीबों और बेसहारा लोगों की मदद करता था, जो देवदत्त को बिल्कुल पसंद नहीं था। देवदत्त का मानना था कि संसार में केवल सोना और संपत्ति ही जीवन का सच हैं, बाकी सब मोहमाया है। अपनी इसी सोच के कारण उसने अपने घर के बाहर एक विशाल सोने की मूर्ति बनवाई थी, ताकि लोग उसकी अमीरी का लोहा मान सकें।

एक दिन, माधव अचानक एक गंभीर और रहस्यमयी बीमारी की चपेट में आ गया। देवदत्त ने देश-विदेश के सबसे महंगे वैद्यों को बुलाया। अपनी सारी धन-दौलत पानी की तरह बहा दी, लेकिन माधव की हालत बिगड़ती ही गई। सोने के सिक्के भी उसके बेटे की उखड़ती सांसों को थामने में असमर्थ थे। देवदत्त भीतर से पूरी तरह टूट चुका था। तभी गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे जंगल में रहने वाले एक सिद्ध संत के बारे में बताया।

महात्मा की कुटिया और अंतिम सत्य

देवदत्त भागता हुआ संत की कुटिया पर पहुँचा। उसने संत के चरणों में सोने की अशर्फियों से भरी थैली रख दी और रोते हुए बोला, “महात्मा जी! मेरे पास अपार धन है, आप जो चाहें ले लें, बस मेरे इकलौते बेटे की जान बचा लीजिए।”

संत ने मुस्कुराते हुए उस थैली को एक तरफ हटा दिया और कहा, “देवदत्त, तुम्हारी यह दौलत यहाँ किसी काम की नहीं। अगर अपने बेटे को बचाना चाहते हो, तो इस जंगल के सबसे पुराने सूखे पेड़ के पास जाओ। उस पेड़ के नीचे एक मिट्टी का घड़ा है। उसमें से पानी लेकर अपने बेटे को पिला दो, वह ठीक हो जाएगा। लेकिन याद रहे, उस घड़े का पानी केवल वही निकाल सकता है जिसके मन में कोई लालच, अहंकार या अमीरी का घमंड न हो।”

जब पिघल गया सोने का अहंकार

देवदत्त तुरंत उस सूखे पेड़ के पास पहुँचा। वहाँ सचमुच एक मिट्टी का साधारण सा घड़ा रखा था। जैसे ही देवदत्त ने पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया, उसके मन में विचार आया कि ‘मैं इतना अमीर आदमी होकर इस तुच्छ मिट्टी के घड़े से पानी ले रहा हूँ।’ जैसे ही उसने घड़े को छुआ, घड़े का पानी खौलने लगा और पल भर में सूख गया। देवदत्त घबरा गया। उसे समझ आ गया कि उसका अहंकार ही इस पवित्र जल को दूषित कर रहा है।

उसने अपनी सोने की अंगूठी घड़े में डाल दी कि शायद सोने के स्पर्श से पानी वापस आ जाए, पर कुछ नहीं हुआ। तब निराश होकर वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसकी सारी धन-दौलत, उसका महल, उसके बेटे की जिंदगी के सामने धूल के समान हैं। उसने सच्चे मन से अपनी भूल स्वीकार की। जैसे ही उसके पश्चाताप के आंसू मिट्टी के घड़े में गिरे, वह घड़ा दोबारा शीतल जल से भर गया।

देवदत्त तुरंत वह जल लेकर घर भागा और माधव को पिलाया। माधव की आँखें खुल गईं और वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया। देवदत्त ने उसी क्षण अपना सारा अहंकार त्याग दिया और अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दीन-दुखियों की सेवा में लगा दिया।

कहानी की सीख

यह लोककथा हमें सिखाती है कि जीवन का सच भौतिक वस्तुओं या धन-दौलत को संचित करने में नहीं है। असली सुख और जीवन की सार्थकता प्रेम, करुणा, सादगी और अपनों के साथ में है। संकट के समय संसार की हर दौलत बेअसर साबित होती है, केवल हमारे द्वारा कमाए गए अच्छे कर्म और हमारी इंसानियत ही काम आती है।

कागा जी