विश्वास की ताकत
रामपुर नाम के एक छोटे से गाँव में राघव नाम का एक चौदह साल का लड़का रहता था। राघव का एक पैर जन्म से ही बेहद कमज़ोर था, जिसके कारण वह बैसाखी के सहारे चलता था। गाँव के बच्चे अक्सर उसे खेल में शामिल नहीं करते थे और उसका मज़ाक उड़ाते थे। राघव को इस बात का गहरा दुःख होता था, लेकिन उसने कभी अपनी लाचारी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। राघव के पिता, शंभू, एक गरीब कुम्हार थे। राघव को मिट्टी से खिलौने और दीये बनाना बहुत पसंद था। जब भी वह मिट्टी को अपने हाथों में लेता, तो जैसे वह अपनी शारीरिक कमजोरी को पूरी तरह भूल जाता था। उसकी उँगलियों में मिट्टी को जीवंत करने का जादुई हुनर था।
चुनौतियों का पहाड़
दिवाली का त्योहार नज़दीक था और पूरा गाँव दीयों की रोशनी से सराबोर होने की तैयारी कर रहा था। शंभू को इस बार बहुत बड़ा काम पूरा करना था, लेकिन अचानक वे गंभीर रूप से बीमार हो गए। वे बिस्तर से उठने की स्थिति में भी नहीं थे। घर में दाने-दाने के लाले पड़ गए। पड़ोसी कुम्हारों ने ताना मारते हुए कहा, “शंभू का तो काम ठप हो गया। अब इस अपाहिज लड़के के बस की बात थोड़े ही है कि वह चाक चलाकर दीये बना सके।”
इन कड़वी बातों ने राघव के दिल को छलनी कर दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने हार मानने के बजाय लड़ने का फैसला किया। उसने अपनी माँ की भीगी आँखों को देखा और कहा, “माँ, तुम चिंता मत करो। हमारे घर का चूल्हा भी जलेगा और लोगों के घर भी रोशन होंगे।”
मिट्टी में फूंके प्राण
चूँकि राघव का एक पैर काम नहीं करता था, इसलिए उसके लिए भारी चाक (कुम्हार का पहिया) को पैर से घुमाना लगभग असंभव था। राघव ने एक नया रास्ता निकाला। उसने अपने हाथों के ज़ोर से चाक को घुमाया और दूसरे हाथ से मिट्टी को आकार देना शुरू किया। यह काम सामान्य से दोगुना थका देने वाला और कठिन था। उसके हाथों में छाले पड़ गए, पीठ में असहनीय दर्द होने लगा, लेकिन राघव रुका नहीं।
उसने मिट्टी के ऐसे अनोखे और सुंदर दीये बनाए, जिन पर बारीक नक्काशी की गई थी। हर दीया अपने आप में एक कलाकृति जैसा लग रहा था। राघव ने अपनी कला में अपना दर्द, अपनी उम्मीद और अपना पूरा वजूद उड़ेल दिया था।
अंधेरे पर रोशनी की जीत
दिवाली से ठीक दो दिन पहले, शहर का एक बड़ा हस्तशिल्प व्यापारी गाँव में मिट्टी के दीये खरीदने आया। जब उसने राघव के बनाए हुए नक्काशीदार दीयों को देखा, तो वह मंत्रमुग्ध रह गया। उसने आज तक इतनी खूबसूरत कलाकारी नहीं देखी थी।
व्यापारी ने राघव से कहा, “बेटा, तुम्हारे इन दीयों में सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि तुम्हारी आत्मा की चमक दिखती है।” उसने राघव के बनाए सारे दीये दोगुनी कीमत पर खरीद लिए और अगले साल के लिए भी एक बहुत बड़ा एडवांस आर्डर दे दिया। राघव के पिता की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। गाँव के लोग जो कल तक राघव का मज़ाक उड़ाते थे, आज उसकी मेहनत और हुनर के सामने नतमस्तक थे।
कहानी की सीख
इस प्रेरणादायक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, और लोग हमारी क्षमताओं पर कितना भी संदेह क्यों न करें, यदि हमारे मन में दृढ़ संकल्प और खुद पर अटूट विश्वास है, तो हम अपनी कमजोरी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकते हैं। सफलता शारीरिक मजबूती से नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता से मिलती है।