प्रणाम! ‘काक-वाणी’ के ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ विभाग में आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे दुनिया के उस सबसे बड़े, सबसे तेज और बिना किसी फीस के चौबीसों घंटे असीमित ज्ञान बांटने वाले संस्थान की, जिसका नाम सुनते ही गूगल भी शरमा जाता है। यहाँ के छात्र और प्रोफेसर इतने प्रतिभावान हैं कि सुबह की पहली किरण के साथ ही देश-दुनिया की तमाम वैज्ञानिक और ऐतिहासिक समस्याओं का ऐसा समाधान खोज लेते हैं, जिसे देखकर नासा और यूनेस्को वाले भी अपना सिर पकड़ लेते हैं।
यूनेस्को का ‘सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय गान’ और हमारी भावनाएं
क्या आपको याद है कि पिछले पांच सालों से हर स्वतंत्रता दिवस पर हमारे राष्ट्रगान को यूनेस्को द्वारा ‘दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान’ घोषित किया जा रहा है? बेचारे यूनेस्को वाले पेरिस में अपने दफ्तर में बैठकर आज भी सोच रहे होंगे कि भाई, हमने कब और किस मीटिंग में यह अवॉर्ड बांट दिया! लेकिन हमारे व्हाट्सएप के ‘कुलपति महोदय’ ने जैसे ही इसे ‘फॉरवर्ड’ की मुहर लगाई, यह अंतिम सत्य बन गया। इस विश्वविद्यालय में तथ्यों की जांच नहीं होती, यहाँ सिर्फ भावनाओं का सैलाब बहता है।
रसोईघर की अलमारी में छुपा है कैंसर का इलाज
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक दशकों से रिसर्च कर रहे हैं और अरबों डॉलर फूंक रहे हैं। लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘परम ज्ञानी’ प्रोफेसरों ने सुबह की चाय की चुस्की के साथ ही इसका रामबाण इलाज खोज लिया है। दावा किया जाता है कि “गर्म पानी में नींबू निचोड़कर पीने से कैंसर के कीटाणु तुरंत दम तोड़ देते हैं।” डॉक्टरों की करोड़ों रुपये की पढ़ाई और रिसर्च एक तरफ, और व्हाट्सएप के फॉरवर्डेड मैसेज का ज्ञान एक तरफ। इस विश्वविद्यालय में लहसुन, अदरक और दालचीनी के चमत्कारों के सामने मॉडर्न मेडिकल साइंस हमेशा पानी भरता नजर आता है।
नासा की नींद उड़ाने वाले दिवाली के दावे
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के पास शायद अपना कोई काम नहीं है। वे साल भर इसी इंतजार में रहते हैं कि कब भारत में दिवाली आए और वे अंतरिक्ष से भारत की चमचमाती तस्वीर खींचें। हर साल वही रंग-बिरंगी एडिटेड फोटो व्हाट्सएप पर तैरती है और हम गर्व से चौड़े हो जाते हैं। नासा वाले भी हैरान हैं कि उनकी सैटेलाइट सिर्फ भारत के पटाखों की रोशनी देखने के लिए ही अंतरिक्ष में चक्कर काट रही है क्या?
सत्य की कड़वी घुट्टी
सच्चाई यह है कि इस फर्जी ज्ञान की यूनिवर्सिटी की डिग्रियां मुफ्त जरूर हैं, लेकिन इसकी भारी कीमत हमारा विवेक चुकाता है। किसी भी संदेश को ‘फॉरवर्ड’ करने से पहले बस दो सेकंड रुककर गूगल बाबा से पूछ लें। वरना, अफवाहों के इस बाजार में आप भी अनजाने में अंधविश्वास के डीलर बन जाएंगे। तो अगली बार जब कोई चमत्कारी मैसेज आए, तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, न कि सिर्फ अपने अंगूठे का!