मोमो से बूंग तक: क्या बॉलीवुड की छाती पर मूंग दलने को तैयार है पूर्वोत्तर का सिनेमा?

जब भी हम भारतीय सिनेमा की बात करते हैं, तो दिमाग में सीधे मुंबई के चमचमाते स्टूडियो, करण जौहर का रोमांस या फिर साउथ का धांसू एक्शन ही आता है। लेकिन ठहरिए! हवा का रुख बदल रहा है। अब ‘काक-वाणी’ की पैनी नजरें उस दिशा में जा रही हैं, जहां से उगता हुआ सूरज भारत को सबसे पहले रोशनी देता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हमारे प्यारे पूर्वोत्तर (Northeast) की, जहां की कहानियां अब सिर्फ लोकल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इंटरनेशनल लेवल पर तहलका मचा रही हैं।

पूर्वोत्तर सिनेमा की नई त्रिमूर्ति: बूंग, अंग और शेप ऑफ मोमो

हाल ही में वोग इंडिया की एक रिपोर्ट ने फिल्म जगत में हलचल मचा दी है। सवाल बड़ा ही जायज है—’Boong’ (बूंग), ‘Angh’ (अंग) और ‘Shape of Momo’ (शेप ऑफ मोमो) जैसी फिल्मों के बाद क्या आखिरकार Northeast Cinema को उसका असली हक मिल रहा है? मणिपुर की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘बूंग’ हो या नागालैंड की विरासत को दर्शाती ‘अंग’, इन फिल्मों ने साबित कर दिया है कि सिनेमा सिर्फ नाच-गाने का नाम नहीं है। यह उन अनकही और अनसुनी कहानियों को पर्दे पर लाने का जरिया है, जिन्हें सालों से मुख्यधारा के बॉलीवुड ने हाशिए पर रखा हुआ था।

सिर्फ स्टीरियोटाइप नहीं, अब चलेगा असली कंटेंट का जादू!

लंबे समय तक बॉलीवुड ने पूर्वोत्तर के किरदारों को केवल सुरक्षाकर्मी, मोमो बेचने वाले या चीनी जैसे दिखने वाले किरदारों के रूप में ही स्क्रीन पर दिखाया है। लेकिन अब समय बदल चुका है। दर्शकों को ‘शेप ऑफ मोमो’ जैसी फिल्में यह बताने आ रही हैं कि वहां के जीवन और संस्कृति में कितनी गहराई है। ‘काक-वाणी’ का मानना है कि अब दर्शक भी ‘वही घिसी-पिटी’ रीमेक फिल्में देखकर ऊब चुके हैं। उन्हें अब असली भारत की असली और जमीनी कहानियां चाहिए, और यही वजह है कि Northeast Cinema आज फिल्म फेस्टिवल्स से लेकर क्रिटिक्स की पहली पसंद बन रहा है।

क्या बॉलीवुड की नींद अब खुलेगी?

सच्चाई तो यह है कि इन फिल्मों को जो अंतरराष्ट्रीय सराहना मिल रही है, वह किसी भी बड़े बजट की बॉलीवुड फिल्म से कहीं ज्यादा प्रामाणिक है। पूर्वोत्तर सिनेमा का यह उभार केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक रचनात्मक क्रांति है। अब समय आ गया है कि हमारी मुख्यधारा की फिल्म इंडस्ट्री भी इन फिल्मों को डिस्ट्रीब्यूशन और स्क्रीन्स में उचित जगह दे, न कि इन्हें सिर्फ ‘आर्ट हाउस सिनेमा’ का ठप्पा लगाकर छोड़ दे। तो अगली बार जब आप वीकेंड पर कोई फिल्म चुनने बैठें, तो एक मौका पूर्वोत्तर की इन नायाब कहानियों को जरूर दें। यकीन मानिए, स्वाद और सुकून दोनों मिलेगा!


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कागा जी