Title: मौसम का मेला
आज तो पूरा मौसम उसके तारीख़ों पर ही था। साफ आसमान, फूलों की ख़ुशबू और ठंडी हवाएं। ईद की छुट्टी के मौक़े पर मुंबई के एक सिनेमा हॉल में मंगलवार शाम को एक मेला लगा हुआ था। सारे नगर का धमाल उसमें था।
मैंने मेले के घूमने के बारे में सुनकर अपने दोस्तों को भी साथ लेकर गए। छोटे बच्चों ने अपनी प्रेमिकाओं को लेकर जुलूस निकाला और हमें बाजार में उत्साह से ले चला। रंग-बिरंगे वस्तुएँ और मीठे-मसाले की खुशबू और मिट्टी की खुशबू उठाते हुए हम सब भटक जाते हुए नज़र आए।
हम सब एक छोटी सी चाय की दुकान पर रुक कर चाय पीने लगे। चाय के साथ उस बच्चे ने भी अपनी खुशियों की व्याख्या की। उसे उसकी नई साईकिल, नए कपड़े और ईद पर माता-पिता से मिलने की खुशी थी। सबने ध्यान से उसकी बातें सुनी और उसे बधाई दी।
फिर से हमें बाजार में ले चला दिया गया। उन भैया ने हमें बड़े-बड़े नृत्य करते हुए अपनी दुकान तक बुलाया। वहां उन्होंने हमें उनके विभिन्न उत्पादों के बारे में बताया। दूर-दूर से आए लोग उनके उत्पादों को देखने एवं खरीदने आते। उनकी दुकान में हमारे सामने दाढ़ी धारी और बौने बने व्यक्तियों ने गीत नृत्य करके उनके उत्पादों की मुख्य मंडी को सजाया।
मैं वहाँ एक लोगों से बात करता हुआ जानता हुआ कि वहाँ नृत्य, संगीत एवं भोजन मिलता है। छोटे बच्चे अपनी मां के साथ घुम रहे थे। वे एक गुब्बारे बँटाते हुए और उनमें से झूमते हुए उड़ा रहे थे। एक शायर अपनी ख़ुशबूदार गजल की पेशकश से वहाँ के लोगों को विनोदित कर रहा था।
मतलब जाना है वहाँ पर बहुत ही मज़ेदार सूचनाएं थी। वहाँ पर सारे लोग बहुत ही निखरे-फुलवारे थे। पता नहीं कब समय गुजर गया और हम सबका मन करता हुआ अपने घर वापस लौटने का।
मैं यह दुनिया से सिखता हूँ कि जहाँ हम रहते हैं, हमें अपनी गतिविधियों के अनुसार मौसम के मेलों, उत्सवों एवं अलग-अलग मौकों में इंटरअक्ट करने की आवश्यकता है। यह टुकड़ा-टुकड़ा जीवन से हमें प्रभावित करता है और हमें इसे अपने मनोवृत्ति का हिस्सा बनाने की सलाह देता है।
मैं स्लोगनों, नृत्य, संगीत एवं कुछ कार्यक्रमों को समझता हूँ जो हमारे कहानियों को एक अच्छा आकार देते हुए हमें जोड़ते हैं। एक छोटा सा मौसम का मेला भी हमें इंसानी जीवन का हर पहलू नहीं बताता है, लेकिन चाहें कुछ माहौल हमें उनके साथ बल देने के लिए है।