यहाँ एक दिल को छू लेने वाली कहानी दी गई

यहाँ एक दिल को छू लेने वाली कहानी दी गई है, जो समय, रिश्तों और जीवन के सच्चे मूल्यों को दर्शाती है।

### **कहानी का शीर्षक: समय की धड़कन और बूढ़ा घड़ीसाज़**

शहर के एक बेहद व्यस्त और शोर-शराबे वाले इलाके की एक संकरी गली में, ‘समय संसार’ नाम की एक छोटी सी दुकान थी। इस दुकान के बाहर एक पुराना, लकड़ी का बोर्ड लटका था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—”यहाँ रुकी हुई घड़ियाँ और थमा हुआ समय, दोनों ठीक किए जाते हैं।”

इस दुकान के मालिक थे देवराज जी। अस्सी बरस के देवराज जी के बाल चांदी जैसे सफेद थे और उनकी आँखों पर हमेशा एक मोटा चश्मा चढ़ा रहता था। वे इस शहर के आखिरी ‘घड़ीसाज़’ (घड़ी ठीक करने वाले) थे, जो आज के डिजिटल युग में भी सुइयों और गियर वाली पुरानी घड़ियों को अपने हाथों से ठीक करते थे। उनके लिए घड़ियाँ केवल समय बताने वाला यंत्र नहीं थीं, बल्कि वे उनमें इंसानी ज़िंदगी की धड़कन सुनते थे।

एक शाम, जब आसमान में सिंदूरी रंग बिखर रहा था, दुकान का दरवाज़ा ज़ोर से खुला। एक युवक हाँफता हुआ अंदर आया। उसके चेहरे पर तनाव की गहरी लकीरें थीं और माथे पर पसीना चमक रहा था। वह अमित था—एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का मैनेजर, जिसके पास बात करने के लिए भी ‘समय’ नहीं था।

अमित ने अपनी जेब से एक पुरानी, सोने की पॉकेट वॉच (जेब घड़ी) निकाली और उसे काउंटर पर रख दिया। उसने हताश होकर कहा, “बाबा, इसे कैसे भी करके ठीक कर दीजिए। यह मेरे दादाजी की घड़ी है। कल सुबह मेरी एक बहुत बड़ी बिजनेस डील है। मेरे दादाजी कहते थे कि यह घड़ी हमारे परिवार की किस्मत है। लेकिन यह आज सुबह अचानक रुक गई। मैंने कई बड़े शोरूम्स में दिखाया, पर सबने कहा कि इसके पार्ट्स अब नहीं मिलते और यह अब कभी नहीं चल सकती।”

देवराज जी ने मुस्कुराते हुए अपना चश्मा ठीक किया। उन्होंने धीरे से उस घड़ी को अपने बूढ़े, कांपते हाथों में लिया। वह घड़ी वाकई अद्भुत थी। उस पर नक्काशी की गई थी, लेकिन समय की धूल और उपेक्षा के कारण उसकी चमक फीकी पड़ गई थी।

उन्होंने अपनी आँख पर मैग्निफाइंग ग्लास (आवर्धक लेंस) लगाया और घड़ी का पिछला हिस्सा खोला। अंदर के छोटे-छोटे गियर धूल से जमे हुए थे। देवराज जी ने अमित की तरफ देखा और पूछा, “बेटा, आखिरी बार तुमने इस घड़ी को चाबी कब दी थी?”

अमित थोड़ा झेंप गया और बोला, “बाबा, मुझे याद नहीं। असल में, मैं अपनी ज़िंदगी की भागदौड़ में इतना व्यस्त रहता हूँ कि इस पर ध्यान ही नहीं गया। मेरे पास खुद के लिए वक्त नहीं है, इस पुरानी घड़ी को चाबी देने का समय कहाँ से निकालता?”

देवराज जी ने एक ठंडी सांस ली। उन्होंने एक बारीक चिमटी उठाई और घड़ी के पुर्जों को साफ करने लगे। उन्होंने काम करते हुए कहा, “बेटा, घड़ियाँ भी इंसानी रिश्तों की तरह होती हैं। अगर इन्हें वक्त पर प्यार और ध्यान की ‘चाबी’ न दी जाए, तो ये अंदर से थम जाती हैं। तुम समय को मुट्ठी में बंद करना चाहते हो, लेकिन क्या सचमुच जी रहे हो?”

अमित को देवराज जी की बातें अजीब लगीं। उसने अपनी कलाई पर बंधी महंगी स्मार्टवॉच की तरफ देखते हुए कहा, “बाबा, मुझे इन दार्शनिक बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरी स्मार्टवॉच मुझे हर सेकंड का हिसाब देती है—हार्ट रेट, स्टेप्स, ईमेल, सब कुछ! मुझे बस यह घड़ी चालू चाहिए, चाहे जितने पैसे लगें।”

देवराज जी चुप रहे। वे बहुत ही धैर्य और एकाग्रता के साथ घड़ी के भीतर के एक छोटे से चक्र (wheel) को साफ कर रहे थे। उन्होंने कहा, “तुम्हारी यह स्मार्टवॉच तुम्हें समय तो बता सकती है, अमित, लेकिन यह तुम्हें ‘समय का अहसास’ नहीं करा सकती। इसमें टिक-टिक की आवाज़ नहीं है। क्या तुम्हें पता है कि पुरानी घड़ियों से टिक-टिक की आवाज़ क्यों आती थी?”

अमित ने नकारात्मक सिर हिलाया।

देवराज जी ने समझाया, “क्योंकि वह आवाज़ हमारे दिल की धड़कन की तरह होती है। वह हमें याद दिलाती है कि हर बीतता हुआ पल अनमोल है। जब तुम्हारे दादाजी इस घड़ी को अपने सीने से लगाकर रखते थे, तो इसकी टिक-टिक उनके दिल की धड़कन से मिल जाती थी। यह घड़ी रुकी नहीं है, बेटा। यह बस थक गई है, क्योंकि तुमने इसके साथ अपने दादाजी की यादों को भी भुला दिया।”

देवराज जी की बातें सीधे अमित के दिल पर लगीं। उसे याद आया कि कैसे बचपन में उसके दादाजी इसी घड़ी को निकालकर उसे कहानियाँ सुनाया करते थे। दादाजी हमेशा कहते थे, “अमित, समय का सबसे सही उपयोग उसे अपनों के साथ बांटने में है।” लेकिन आज अमित के पास अपनी माँ का फोन उठाने तक का समय नहीं था, जो गाँव में अकेली रहती थीं। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भी केवल छुट्टियों में ही ‘शारीरिक रूप से’ मौजूद रहता था, मानसिक रूप से वह हमेशा अपने लैपटॉप और फोन में खोया रहता था।

कमरे में कुछ देर के लिए केवल दीवारों पर लटकी दर्जनों घड़ियों की सामूहिक टिक-टिक की आवाज़ गूंजती रही। अमित का अहंकार धीरे-धीरे पिघल रहा था। उसकी आँखें नम हो गईं।

तभी, देवराज जी ने घड़ी के मुख्य स्प्रिंग को धीरे से घुमाया और उसमें एक नन्ही सी बूंद तेल की डाली। उन्होंने घड़ी का ढक्कन बंद किया और उसे अमित के कान के पास ले गए।

*टिक… टिक… टिक… टिक…*

अमित के चेहरे पर एक जादुई मुस्कान तैर गई। घड़ी फिर से जीवित हो उठी थी। उसकी आवाज़ इतनी स्पष्ट और मधुर थी जैसे कोई भूला हुआ पुराना गीत बज रहा हो।

“यह तो चलने लगी!” अमित ने उत्साह से कहा।

“हाँ,” देवराज जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसके पुर्जों में कोई बड़ी खराबी नहीं थी। बस थोड़ी सी धूल जम गई थी और इसे अपनों के छुअन की ज़रूरत थी। ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारी ज़िंदगी पर काम के तनाव की धूल जम गई है।”

अमित ने अपनी जेब से बटुआ निकाला, “बाबा, आपकी फीस?”

देवराज जी ने अपना हाथ उठा दिया और कहा, “इसकी कोई फीस नहीं है, बेटा। बस मुझे एक वचन दो। आज जब तुम यहाँ से जाओ, तो अपनी इस डिजिटल घड़ी को थोड़ी देर के लिए बंद करना और अपनी माँ को फोन करके उनके साथ कुछ पल बिताना। अपनी पत्नी और बच्चों के हाथ में हाथ डालकर बैठना और इस पॉकेट वॉच की टिक-टिक सुनना।”

अमित की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने देवराज जी के पैर छुए। उसने पॉकेट वॉच को अपने सीने से लगा लिया। उसे महसूस हुआ कि सालों बाद उसके दिल की धड़कन और उस घड़ी की धड़कन एक लय में धड़क रही थीं।

जब अमित दुकान से बाहर निकला, तो शहर का शोर उसे परेशान नहीं कर रहा था। हवा में एक अजीब सा सुकून था। उसने अपनी जेब से फोन निकाला, लेकिन ऑफिस का मेल चेक करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी माँ का नंबर मिलाने के लिए।

पीछे दुकान में, देवराज जी ने चश्मा उतारा, उसे साफ किया और मुस्कुराते हुए अपनी अगली घड़ी की मरम्मत में जुट गए। उन्हें पता था कि आज उन्होंने केवल एक घड़ी नहीं, बल्कि एक इंसान का थमा हुआ जीवन फिर से शुरू कर दिया था।

कागा जी